Farmers Update : प्रतापगढ़ जिले के पट्टी इलाके में पान की खेती लंबे समय से किसानों की आजीविका का मुख्य स्रोत रही है। यहां करीब 30,000 किसान पान की खेती में सक्रिय हैं, लेकिन हाल के वर्षों में इस पारंपरिक कारोबार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। खेती में लागत बढ़ गई है और पर्याप्त सरकारी सहायता न मिलने के कारण किसानों की आमदनी घट रही है।
मंडी में नहीं मिलता उचित मूल्य
किसानों ने बताया कि खेती के लिए जरूरी बांस, पैरा और अन्य सामग्री महंगी हो गई है। पान की फसल के लिए बने छायादार ढांचे, जिन्हें बरेजा कहा जाता है, की लागत भी कई किसानों के लिए भारी साबित हो रही है। खेती से लेकर मंडी तक पान पहुंचाने की प्रक्रिया में पूरे परिवार की मेहनत लगती है, फिर भी मंडी में उचित मूल्य नहीं मिलता।
असमानता बढ़ा रही किसानों की परेशानी
सरकारी मदद की कमी एक बड़ी समस्या है। पान को कृषि विभाग में शामिल न किया जाना, बैंक लोन और बीमा सुविधाओं का अभाव, और अनुदान वितरण में असमानता किसानों की परेशानी बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण की आवश्यकता है, लेकिन उद्यान विभाग द्वारा पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता।
पान निर्यात बंद होने से पड़ा असर
मौसम और प्राकृतिक आपदाएं भी नुकसान का कारण हैं। अचानक बारिश, अत्यधिक गर्मी और ठंड पान की फसल को बर्बाद कर देते हैं। कई किसान मजबूरी में बनारस, जौनपुर और सुल्तानपुर जैसे शहरों में जाकर पान बेचने को मजबूर हैं। निर्यात में कमी भी किसानों की आय पर असर डाल रही है, खासकर पाकिस्तान को पान निर्यात बंद होने से बिक्री घट गई है।
पान को दिया जाए कृषि का दर्जा
भारत में पान की खेती 100,000 एकड़ से अधिक क्षेत्र में की जाती है, जिसमें उत्तर पूर्वी राज्य जैसे असम, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक प्रमुख हैं। यूपी के कई जिलों में भी पान खेती आमदनी का जरिया है। किसान चाहते हैं कि पान को कृषि का दर्जा दिया जाए, ताकि उन्हें लोन, बीमा और अनुदान जैसी सुविधाएं मिल सकें और पारंपरिक खेती सुरक्षित बनी रहे। प्रतापगढ़ के पान किसान अब सरकारी हस्तक्षेप और बेहतर बाजार व्यवस्था की उम्मीद में हैं, ताकि यह सदियों पुरानी परंपरा और आजीविका बनी रहे।
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