Cotton Crisis : कपास की खेती, जो कभी भारतीय किसानों की आर्थिक मजबूती का आधार मानी जाती थी, आज कई चुनौतियों के कारण घाटे का सौदा बनती जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में करीब 20 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई कम होना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि कृषि व्यवस्था में आए बड़े बदलाव का संकेत है।
भारत, जो कभी कपास का बड़ा निर्यातक था, अब कई मामलों में आयात पर निर्भर होता दिख रहा है। इसकी प्रमुख वजहों में तकनीकी पिछड़ापन, मूल्य अस्थिरता और नीतिगत कमियाँ शामिल हैं, जिन्होंने इस फसल की उत्पादकता और लाभ दोनों को प्रभावित किया है। देश की औसत कपास उत्पादकता अब भी वैश्विक स्तर से पीछे है, जो किसानों की चिंता को और बढ़ाती है।
आधुनिक तकनीक और बेहतर बीज
इसी स्थिति को सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने हाल ही में “कपास उत्पादकता मिशन” को मंजूरी दी है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2031 तक प्रति हेक्टेयर उत्पादन को 440 किलोग्राम से बढ़ाकर 755 किलोग्राम तक पहुंचाना है। इसके तहत कुल उत्पादन को 498 लाख गांठ तक ले जाने की योजना है। इस मिशन में देश के 14 राज्यों के 140 जिलों को शामिल किया गया है, जहां आधुनिक तकनीक और बेहतर बीजों के उपयोग पर जोर दिया जाएगा। साथ ही करीब 2000 प्रसंस्करण इकाइयों को विकसित करने की भी योजना है, जिससे लगभग 32 लाख किसानों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।
फसल को बॉलवर्म जैसे कीटों से बचाना
भारत में कपास की उत्पादकता में एक बड़ा बदलाव Bt Cotton तकनीक के आने के बाद देखा गया था, जिसे 2002 में व्यावसायिक रूप से अपनाया गया। यह तकनीक शुरू में Bollgard-I और बाद में Bollgard-II के रूप में विकसित हुई, जिसका उद्देश्य फसल को बॉलवर्म जैसे कीटों से बचाना था। शुरुआती वर्षों में इससे उत्पादन में वृद्धि भी हुई और 2013-14 के आसपास कपास उत्पादन अपने उच्च स्तर पर पहुंचा। लेकिन समय के साथ कीटों ने इस तकनीक के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर लिया, जिससे इसका प्रभाव कम होने लगा।
अंदरूनी हिस्से को पहुंचाता है नुकसान
विशेषज्ञों के अनुसार, कपास उत्पादन में गिरावट की एक बड़ी वजह गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) का बढ़ता प्रकोप भी है। यह कीट कपास के अंदरूनी हिस्से को नुकसान पहुंचाता है और उस पर सामान्य कीटनाशकों का असर भी सीमित होता है। कई राज्यों में यह कीट 30 से 90 प्रतिशत तक फसल को नुकसान पहुंचा चुका है, जिससे किसान लगातार कपास की खेती से दूरी बनाने लगे हैं।
प्रभावी कीट नियंत्रण पर काम
इसके अलावा, पुराने और नए बीजों के बीच संतुलन की कमी, लगातार नई तकनीक का अभाव और कीट प्रबंधन की कमजोर व्यवस्था भी इस संकट को और गहरा कर रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते नई तकनीक, बेहतर बीज और प्रभावी कीट नियंत्रण पर काम नहीं किया गया, तो भारत की कपास अर्थव्यवस्था पर इसका दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।
पुरानी सफलताओं पर निर्भर रहकर…
कुल मिलाकर, कपास की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि केवल पुरानी सफलताओं पर निर्भर रहकर आगे बढ़ना संभव नहीं है, बल्कि लगातार नवाचार और मजबूत नीति समर्थन की आवश्यकता है।
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