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एम्स की चेतावनी, स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चों की भाषा और सामाजिक क्षमता पर पड़ सकता है असर

Screen Time Risk : All India Institute of Medical Sciences के विशेषज्ञों ने बच्चों में बढ़ते स्क्रीन टाइम को लेकर अभिभावकों को सतर्क रहने की सलाह दी है। डॉक्टरों का कहना है कि कम उम्र में मोबाइल, टीवी और अन्य डिजिटल स्क्रीन का अधिक इस्तेमाल बच्चों के मानसिक, सामाजिक और व्यवहारिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

प्राकृतिक विकास में आती है बाधा

पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी विभाग की विशेषज्ञ Shafali Gulati के अनुसार जन्म से लेकर 18 महीने तक के बच्चों को किसी भी प्रकार की स्क्रीन से दूर रखना बेहतर माना जाता है। इस उम्र में बच्चों का मस्तिष्क तेजी से विकसित होता है और अत्यधिक स्क्रीन एक्सपोजर उनके प्राकृतिक विकास को प्रभावित कर सकता है।

संवाद कौशल पर पड़ता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक स्क्रीन देखने वाले बच्चों में भाषा सीखने की क्षमता कमजोर हो सकती है। इसके अलावा उनके सामाजिक व्यवहार और संवाद कौशल पर भी असर पड़ सकता है। डॉक्टरों ने यह भी बताया कि कुछ मामलों में बच्चों में ऐसे व्यवहारिक संकेत दिखाई देते हैं जो ऑटिज्म जैसे लग सकते हैं, हालांकि इसे सीधे तौर पर ऑटिज्म का कारण नहीं माना गया है।

बातचीत और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होना

डॉक्टरों ने सलाह दी है कि 18 महीने से लेकर 6 साल तक के बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित रखा जाए। इस दौरान बच्चों को आउटडोर गतिविधियों, खेलकूद, परिवार के साथ बातचीत और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना अधिक जरूरी है ताकि उनका मानसिक और भावनात्मक विकास बेहतर तरीके से हो सके।

Every Life has Value” थीम

हर वर्ष अप्रैल महीने को दुनियाभर में ऑटिज्म जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 के लिए संयुक्त राष्ट्र ने “Autism & Humanity: Every Life has Value” थीम निर्धारित की है। इसी कड़ी में एम्स दिल्ली में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से जुड़ी चुनौतियों और समाधान पर विशेष जनस्वास्थ्य व्याख्यान आयोजित किया जा रहा है।

बच्चों के विकास में सकारात्मक सुधार

विशेषज्ञों के अनुसार ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण 12 से 18 महीने की उम्र में पहचाने जा सकते हैं। समय पर पहचान और सही हस्तक्षेप से बच्चों के विकास में सकारात्मक सुधार संभव है। आंकड़ों के मुताबिक, बड़ी संख्या में बच्चे ऑटिज्म से प्रभावित पाए जा रहे हैं, जिससे यह एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है।

समस्याएं और नींद से जुड़ी परेशानियां

एम्स के विशेषज्ञों ने बताया कि ऑटिज्म से प्रभावित कई बच्चों में अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी देखने को मिलती हैं, जिनमें मिर्गी, ध्यान की कमी, व्यवहारिक समस्याएं और नींद से जुड़ी परेशानियां शामिल हैं। इन चुनौतियों का असर बच्चों के साथ-साथ उनके परिवारों के जीवन पर भी पड़ता है।

इलाज अपनाने से बच्चों को बेहतर जीवन

डॉक्टरों का कहना है कि ऑटिज्म से जुड़े मामलों में परिवार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। सही जानकारी, नियमित देखभाल और वैज्ञानिक तरीके से इलाज अपनाने से बच्चों को बेहतर जीवन दिया जा सकता है। साथ ही बिना प्रमाण वाली वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों से बचने की भी सलाह दी गई है। इस तरह की जागरूकता पहलों का उद्देश्य समाज में समझ बढ़ाना और ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों को सम्मानजनक और बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है, ताकि वे भी सामान्य जीवन में आगे बढ़ सकें।

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