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पद्म श्री 2026: डॉ. पदमा गुरमेद ने बचाई सोवा-रिग्पा की विरासत, डॉ. सुरेश हनगवाड़ी ने हीमोफिलिया मरीजों के लिए समर्पित किया जीवन

Padma Shri Award 2026 : हिमालय की शांत वादियों में सदियों पुरानी एक चिकित्सा परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रही थी। यह परंपरा थी सोवा-रिग्पा, जिसमें नाड़ी देखकर बीमारी को समझना और दुर्लभ जड़ी-बूटियों के जरिए उपचार करना शामिल है। करीब 2,500 साल पुरानी इस उपचार पद्धति को बचाने और आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया डॉ. पदमा गुरमेद ने।  

डॉ. गुरमेद का मानना था कि कुछ विरासतें केवल इतिहास का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी होती है।

कौन हैं डॉ. पदमा गुरमेद?

डॉ. पदमा गुरमेद राष्ट्रीय सोवा-रिग्पा संस्थान, लेह के संस्थापक निदेशक और लद्दाख अमची सभा, लेह-लद्दाख के अध्यक्ष हैं। वह आयुष चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत सोवा-रिग्पा को औपचारिक पहचान दिलाने और लद्दाख समेत अन्य हिमालयी क्षेत्रों में इसके व्यवस्थित विकास के प्रमुख लोगों में शामिल रहे हैं। सोवा-रिग्पा नीति निर्माण, नियमों, शोध और परियोजना प्रबंधन के क्षेत्र में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

बचपन से शुरू हुआ था विरासत को बचाने का सफर

डॉ. पदमा गुरमेद का जुड़ाव सोवा-रिग्पा से बचपन में ही हो गया था। वह अक्सर अपने पिता को दवाइयां तैयार करते और लोगों का इलाज करते देखते थे।

हालांकि शुरुआत में वह इस चिकित्सा पद्धति को सीखना नहीं चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने उन्हें इसकी अहमियत समझाई। धीरे-धीरे यही परंपरा उनके जीवन का उद्देश्य बन गई। डॉ. गुरमेद का मानना था कि उन्होंने सोवा-रिग्पा को नहीं चुना, बल्कि सोवा-रिग्पा ने उन्हें चुना।

किताबों, शोध और सम्मेलनों के जरिए बचाई परंपरा

किसी पुरानी विरासत को बचाना आसान नहीं होता। डॉ. गुरमेद ने सोवा-रिग्पा के संरक्षण के लिए कई स्तरों पर काम किया। उन्होंने इस चिकित्सा पद्धति पर कई किताबें लिखीं, पुराने ग्रंथों को एकत्रित किया और सोवा-रिग्पा चिकित्सकों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया। इसके लिए कई सम्मेलन भी आयोजित किए गए, जिससे इस परंपरा को नई दिशा मिली।

हिमालयी क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था का अहम हिस्सा रही सोवा-रिग्पा

सोवा-रिग्पा चिकित्सा भारतीय बौद्ध परंपरा से जुड़ी प्राचीन चिकित्सा प्रणाली है। लद्दाख और अन्य दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में यह लंबे समय तक स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ रही है। इस पद्धति में प्राकृतिक संसाधनों, जड़ी-बूटियों और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर उपचार किया जाता है। बदलते समय में इस विरासत को संरक्षित करना एक बड़ी चुनौती थी, जिसे डॉ. गुरमेद ने स्वीकार किया।

23 जून 2026 को राष्ट्रपति भवन में मिलेगा पद्म श्री सम्मान

भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 23 जून, 2026 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले नागरिक अलंकरण समारोह-ll में डॉ. पदमा गुरमेद को वर्ष 2026 के लिए पद्म श्री पुरस्कार प्रदान करेंगी।

यह सम्मान केवल एक चिकित्सक के योगदान का सम्मान नहीं है, बल्कि उस प्राचीन ज्ञान परंपरा को भी पहचान देता है, जिसे बचाने के लिए डॉ. पदमा गुरमेद ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

डॉ. सुरेश हनगवाड़ी को भी किया जाएगा सम्मानित

चिकित्सा क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉ. सुरेश हनगवाड़ी को भी वर्ष 2026 के लिए पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 23 जून, 2026 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले नागरिक अलंकरण समारोह-ll में उन्हें यह सम्मान प्रदान करेंगी।

डॉ. सुरेश हनगवाड़ी कर्नाटक हीमोफिलिया सोसाइटी दावणगेरे (केएचएस) के संस्थापक और अध्यक्ष हैं। वह एक प्रतिष्ठित चिकित्सा पेशेवर, संस्था निर्माता और भारत में हीमोफिलिया तथा दुर्लभ रक्तस्राव विकारों से पीड़ित लोगों के अधिकारों और बेहतर इलाज के लिए लंबे समय से काम करने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल हैं।

खुद बीमारी से जूझते हुए दूसरों के लिए बने सहारा

डॉ. सुरेश हनगवाड़ी स्वयं गंभीर हीमोफिलिया-बी से पीड़ित हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपनी व्यक्तिगत चुनौतियों को समाज सेवा के संकल्प में बदल दिया। पिछले चार दशकों से अधिक समय में उन्होंने हीमोफिलिया मरीजों के लिए बीमारी की पहचान, उपचार, पुनर्वास और जीवन की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में लगातार काम किया है।

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