BrahMos Missile Export : पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर में दुनिया ने भारत का पराक्रम देखा। भारत ने पाकिस्तान को घर में घुसकर मिट्टी में मिलाया। जिसके बाद से भारत की आधुनिक मिसाइलें चर्चा का विषय बनी हुई है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही विदेशों ने भारत की आधुनिक शक्ति को अपनाने में गहरी रुचि दिखाई। वहीं मिसाइलों, डिफेंस सिस्टम आदि आधुनिक उपकरणों की खरीद मांग बढ़ गई है।
सीमित सैन्य प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं भारत
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की रक्षा तैयारियों और सैन्य खरीद नीति में बदलाव देखने को मिला। हाल के महीनों में स्वीकृत रक्षा प्रस्तावों से संकेत मिलता है कि भारतीय सशस्त्र बल अब केवल सीमित सैन्य प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले और कई स्तरों पर लड़े जाने वाले संघर्षों के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं।
रक्षा परियोजनाओं और खरीद प्रस्तावों को मंजूरी
संघर्ष के बाद रक्षा अधिग्रहण परिषद ने बड़ी संख्या में रक्षा परियोजनाओं और खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी है, जिनकी अनुमानित कुल लागत लगभग 9.80 लाख करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। यह निवेश चरणबद्ध तरीके से आने वाले वर्षों में हथियार प्रणालियों, सैन्य उपकरणों, उत्पादन इकाइयों और आधुनिकीकरण कार्यक्रमों पर किया जाएगा।
आर्थिक और सैन्य दबाव बनाए रखने की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक परिस्थितियों ने भारत की रणनीतिक सोच को प्रभावित किया है। वर्तमान दौर में युद्ध की आशंका पहले की तुलना में अधिक वास्तविक मानी जा रही है और एक बार संघर्ष शुरू होने के बाद उसे शीघ्र समाप्त करना आसान नहीं रह गया है। इसके अलावा, आधुनिक युद्धों में विरोधी पक्ष अक्सर लंबे समय तक आर्थिक और सैन्य दबाव बनाए रखने की रणनीति अपनाते हैं।
पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों से जुड़ी परियोजनाओं
इसी को ध्यान में रखते हुए नई रक्षा योजनाओं में हथियारों के पर्याप्त भंडारण, सैन्य उपकरणों की तेज मरम्मत व्यवस्था और मजबूत लॉजिस्टिक सपोर्ट पर विशेष जोर दिया जा रहा है। यूक्रेन और पश्चिम एशिया में लंबे समय तक चले सैन्य संघर्षों ने भी भारत की रक्षा नीति और तैयारी के दृष्टिकोण को प्रभावित किया है। हालांकि, अत्याधुनिक पनडुब्बियों और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों से जुड़ी परियोजनाओं में देरी अब भी चिंता का विषय बनी हुई है।
भारत की रक्षा तकनीक के प्रति रुचि बढ़ाई
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान स्वदेशी रक्षा प्रणालियों जैसे ब्रह्मोस मिसाइल, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, लॉयटरिंग म्युनिशन और नेत्र निगरानी प्रणाली के प्रदर्शन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की रक्षा तकनीक के प्रति रुचि बढ़ाई है। कई देशों ने भारतीय रक्षा उपकरणों की खरीद में दिलचस्पी दिखाई है और कुछ देशों के साथ बड़े निर्यात समझौते भी किए जा चुके हैं।
कई देशों के साथ हजारों करोड़ रुपये के समझौते
रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 62 प्रतिशत अधिक है। ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली के लिए फिलीपींस सहित कई देशों के साथ हजारों करोड़ रुपये के समझौते हुए हैं, जबकि इंडोनेशिया के साथ भी एक महत्वपूर्ण सौदा अंतिम चरण में बताया जा रहा है।
100 से अधिक देशों में भारत कर रहा सप्लाई
आकाश मिसाइल प्रणाली के लिए आर्मेनिया के साथ पहले ही बड़ा रक्षा अनुबंध किया जा चुका है। वर्तमान समय में भारत 100 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण और सैन्य प्रणालियां निर्यात कर रहा है, जिनमें अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया प्रमुख बाजारों के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
भारत से सीधे तैयार सैन्य प्रणालियां
अमेरिका भारतीय रक्षा निर्यात का सबसे बड़ा गंतव्य बना हुआ है, जहां विभिन्न सैन्य प्रणालियां, पुर्जे और उपकरण वैश्विक रक्षा कंपनियों तक पहुंचाए जाते हैं। दूसरी ओर, आर्मेनिया जैसे देश भारत से सीधे तैयार सैन्य प्रणालियां और हथियार खरीद रहे हैं।
50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य
सरकार ने वर्ष 2029-30 तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। तुलना करें तो वर्ष 2016-17 में भारत का रक्षा निर्यात केवल 1,522 करोड़ रुपये था। इस प्रकार एक दशक से भी कम समय में भारतीय रक्षा निर्यात में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है, जो देश के रक्षा उत्पादन और आत्मनिर्भरता अभियान की सफलता को दर्शाती है।
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