
New Delhi : पश्चिम बंगाल में 8 जनवरी को हुई एक घटनाक्रम ने राजनीतिक और कानूनी हलकों में हड़कंप मचा दिया है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई जांच की मांग की है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने SC में दायर याचिका में आरोप लगाया है कि कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 8 जनवरी को जांच के दौरान सीएम बनर्जी और कुछ अधिकारियों ने जो किया है वह चोरी, लूट और डकैती के दायरे में आता है।
ईडी का कहना है कि जब पश्चिम बंगाल में हमारे अधिकारी 8 जनवरी को 2,742 करोड़ रुपये से अधिक की आपराधिक आय से जुड़े बहु-राज्यीय कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के सिलसिले में जब हमारे अधिकारी कानूनी रूप से तलाशी अभियान चला रहे थे। तभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पुलिस महानिदेशक, कोलकाता पुलिस आयुक्त और भारी संख्या में पुलिस बल के साथ कथित तौर पर परिसर में घुस गए। इसके बाद, ईडी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की, जिसमें सीबीआई से इस मामले में एफआईआर दर्ज करने और स्वतंत्र जांच शुरू करने की अपील की गई है।
धमकियों और जब्ती पर आरोप
ईडी का आरोप है कि ममता बनर्जी और अन्य पुलिस अधिकारियों ने उनके अधिकारियों को धमकाया, गलत तरीके से हिरासत में लिया और तलाशी के दौरान जब्त की गई सामग्री, जिसमें लैपटॉप, मोबाइल फोन और दस्तावेज शामिल थे, उसे जबरन हटा लिया। ईडी के अनुसार, यह घटना भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत कई अपराधों की श्रेणी में आती है, जैसे कि चोरी, डकैती, लूट, आपराधिक अतिक्रमण, लोक सेवकों के काम में बाधा डालना, सबूतों को नष्ट करना और आपराधिक धमकी।
दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जब्ती की मांग
ईडी ने इस मामले में दायर अपनी रिट याचिका में कोर्ट से राज्य अधिकारियों द्वारा जब्त किए गए सभी दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तत्काल जब्ती, सीलबंदी, फोरेंसिक संरक्षण और बहाली की मांग की है। इसके अलावा, ईडी ने पश्चिम बंगाल पुलिस को पीएमएलए (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट) कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से रोकने के लिए एक निषेधाज्ञा जारी करने की भी अपील की है।
अधिकारियों की सुरक्षा की मांग
ईडी ने इस दौरान यह भी कहा कि उनके अधिकारी किसी भी प्रकार की दमनकारी कार्रवाई से सुरक्षित रहें। उन्होंने पीएमएलए की धारा 67 का हवाला देते हुए सीबीआई से यह अनुरोध किया कि इस मामले से संबंधित सभी एफआईआर को स्थानांतरित किया जाए और अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान की जाए।
हाईकोर्ट में विफल प्रयास
ईडी ने इस घटना से संबंधित उच्च न्यायालय में राहत की कोशिश की थी, लेकिन वहाँ भी न्यायाधीशों को सुनवाई के लिए अनुकूल माहौल नहीं मिल पाया और मामले को स्थगित कर दिया गया। कोर्ट के अंदर हंगामे के कारण अदालत को फैसला सुनाने में असमर्थता जतानी पड़ी।
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