
Allahabad High Court : शादी-ब्याह हमारी ज़िंदगी का सबसे अहम और पवित्र रिश्ता माना जाता है. लेकिन अक्सर लोग ये सोचकर परेशान हो जाते हैं कि अगर शादी रजिस्टर नहीं हुई तो क्या वो शादी मान्य है या नहीं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस उलझन को दूर कर दिया है और एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने कई घरों को सुकून दे दिया है. अदालत ने साफ कहा कि शादी की असली अहमियत उसके संस्कार और रीति-रिवाज़ में है, कागज़ी पंजीकरण सिर्फ़ सबूत है, असलियत नहीं ये फैसला उन तमाम जोड़ों के लिए राहत की सांस है जिनकी शादी पुराने वक़्त में हुई और अब तक रजिस्टर नहीं हो पाई.
पंजीकरण न होने पर भी हिंदू विवाह मान्य
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि हिंदू विवाह की वैधता केवल विवाह पंजीकरण पर निर्भर नहीं करती. यदि विवाह पंजीकृत नहीं है, तो भी इसे अवैध या अमान्य नहीं माना जा सकता. अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र केवल विवाह का साक्ष्य है, न कि विवाह की वैधता का मूल आधार.
आखिर पूरा मामला क्या है
यह आदेश आजमगढ़ के निवासी सुनील दुबे की याचिका पर दिया गया. उन्होंने अपनी पत्नी मीनाक्षी के साथ 23 अक्टूबर 2024 को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(बी) के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर की थी. फैमिली कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पति से विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र दाखिल करने को कहा.
सुनील दुबे ने यह कहते हुए छूट की मांग की कि उनका विवाह 27 जून 2010 को हुआ था और उस समय विवाह पंजीकरण अनिवार्य नहीं था. इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने 31 जुलाई 2025 को उनका आवेदन खारिज कर दिया और कहा कि नियमों के अनुसार विवाह प्रमाणपत्र दाखिल करना अनिवार्य है.
याचिकाकर्ता की दलील
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 में विवाह पंजीकरण का प्रावधान जरूर है, लेकिन पंजीकरण न होने पर विवाह अमान्य नहीं होता. साथ ही, उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियमावली, 2017 विवाह के लागू होने से पहले हुए विवाहों पर लागू नहीं होती. नियमावली की धारा 6 में भी यह स्पष्ट है कि पंजीकरण के अभाव में विवाह अमान्य नहीं होगा. पत्नी मीनाक्षी ने भी पति की इस दलील का समर्थन किया.
हाईकोर्ट का निर्णय
जस्टिस मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने कहा कि विवाह पंजीकरण का उद्देश्य केवल विवाह को साबित करने का एक सुविधाजनक साधन उपलब्ध कराना है. इसका उल्लंघन विवाह की वैधता को प्रभावित नहीं करता. अधिनियम की धारा 8(5) में भी यही प्रावधान है कि पंजीकरण न होने से विवाह अमान्य नहीं होगा.
कोर्ट ने माना कि 2010 का विवाह पंजीकृत नहीं था, इसलिए विवाह प्रमाणपत्र दाखिल करने की कोई बाध्यता नहीं थी. फैमिली कोर्ट का आदेश पूरी तरह अनुचित बताते हुए हाईकोर्ट ने उसे रद्द कर दिया और तलाक की लंबित याचिका पर शीघ्र निर्णय करने का निर्देश दिया.
फैसले का महत्व
यह फैसला उन दंपतियों के लिए राहत लेकर आया है जिनके विवाह पुराने समय में हुए और पंजीकृत नहीं हैं. अब केवल पंजीकरण प्रमाणपत्र के अभाव में विवाह या तलाक की कार्यवाही बाधित नहीं होगी.
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