गणराज्य के जीवन में कुछ ऐसे अवसर आते हैं, जब विश्वविद्यालयों से उठने वाली आवाजों पर संसद और विधानसभाओं में गूंजने वाली तालियों से अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। दिल्ली में हाल में हुए छात्र विरोध-प्रदर्शन ऐसा ही एक अवसर हैं। उन्हें केवल राजनीतिक आंदोलन कहकर खारिज करना समस्या को समझने में भूल होगी। ये प्रदर्शन, दरअसल, भारतीय शिक्षा व्यवस्था के भीतर लंबे समय से जमा हो रही एक गहरी चिंता की अभिव्यक्ति हैं। यह चिंता है कि जिन संस्थाओं को योग्यता और निष्पक्षता की रक्षा करनी चाहिए, वे अब उन्हें पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं रख पा रही हैं।

भारत की युवा आबादी: अवसर या बोझ?
भारत लंबे समय से अपनी युवा आबादी को अपनी बड़ी ताकत मानता रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के अनुसार, भारत की लगभग 68% आबादी कामकाजी आयु वर्ग (15–64 वर्ष) में है। यह भारत को वह अवसर देता है, जो कई विकसित देशों के पास अब पहले जैसा नहीं रहा।लेकिन इतिहास हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखाता है। युवा आबादी अपने आप में महानता की गारंटी नहीं होती। वह केवल एक अवसर होती है। यह अवसर आर्थिक और सामाजिक शक्ति बनेगा या बोझ, यह शिक्षा की गुणवत्ता, सार्वजनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और इस विश्वास पर निर्भर करता है कि ईमानदार मेहनत को उसका उचित फल मिलेगा।आज कई युवा भारतीयों को यही विश्वास कमजोर पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है।
शिक्षा में उपलब्धियां और गुणवत्ता की चुनौतियां
निष्पक्ष रूप से देखें तो पिछले दशक में कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियां भी हुई हैं। स्कूलों में नामांकन ऊंचा बना हुआ है। डिजिटल ढांचा तेजी से बढ़ा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) ने शिक्षा सुधार के लिए एक महत्वाकांक्षी दिशा प्रस्तुत की है। इन उपलब्धियों को स्वीकार किया जाना चाहिए।लेकिन संख्या को गुणवत्ता नहीं समझा जा सकता। शिक्षा की असली कसौटी यह नहीं है कि कितने स्कूल बनाए गए या कितनी डिग्रियां दी गईं। असली कसौटी यह है कि शिक्षा व्यक्ति में किस तरह की सोच विकसित करती है और उसके लिए किस तरह के अवसर पैदा करती है।सीखने के स्तर से जुड़ा आंकड़ा अभी भी चिंता पैदा करता है। वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (ASER 2024) में महामारी के बाद सुधार दिखाई देता है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में बच्चे अभी भी अपनी कक्षा के स्तर के अनुसार बुनियादी पढ़ने और गणित की क्षमता हासिल नहीं कर पाए हैं।इसी तरह, भारत में अब 1,100 से अधिक विश्वविद्यालय और 45,000 से अधिक कॉलेज हैं। इनमें लगभग 4.3 करोड़ विद्यार्थी पढ़ते हैं (AISHE 2021–22)। इसके बावजूद स्नातकों की रोजगार क्षमता को लेकर लगातार चिंता बनी हुई है। India Skills Report जैसी उद्योग आधारित रिपोर्टों में बार-बार बताया गया है कि कई स्नातकों में संवाद क्षमता, विश्लेषण करने की क्षमता और काम के लिए जरूरी कौशल की कमी है।
शिक्षा और शोध में निवेश की कमी
शिक्षा में निवेश भी हमारी महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप नहीं बढ़ा है। शिक्षा पर सरकारी खर्च सामान्यतः GDP का लगभग 4–4.5% रहा है। इसके विपरीत, कोठारी आयोग (1966) ने शिक्षा पर GDP का 6% खर्च करने की सिफारिश की थी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी इसी लक्ष्य को दोहराया है।शोध और विकास पर भारत का खर्च भी GDP के लगभग 0.6–0.7% के आसपास रहा है। यह दक्षिण कोरिया (लगभग 5%), इजरायल (लगभग 6%), अमेरिका (लगभग 3.5%) और चीन (लगभग 2.6%) जैसे देशों से काफी कम है। जो देश ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में नेतृत्व करना चाहता है, उसे केवल ज्ञान का उपयोग करने में नहीं, बल्कि नया ज्ञान पैदा करने में भी निवेश करना होगा।
संस्थाओं पर भरोसे का संकट
लेकिन आज भारतीय शिक्षा के सामने सबसे गंभीर चुनौती केवल धन की कमी नहीं है। समस्या संस्थाओं पर भरोसे के धीरे-धीरे कमजोर होने की भी है।प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों युवाओं के लिए सामाजिक और आर्थिक प्रगति का सबसे बड़ा रास्ता हैं। कई परिवार एक परीक्षा के लिए वर्षों की मेहनत, बचत और उम्मीद लगा देते हैं। इसलिए इस व्यवस्था की विश्वसनीयता एक मूल सिद्धांत पर टिकी है: योग्यता की जीत होनी चाहिए।
परीक्षा पेपर लीक और विश्वसनीयता का मुद्दाहाल के वर्षों में इस विश्वास को कई बार झटका लगा है। India Today की एक जांच में 2019 से 2024 के बीच 19 राज्यों में कम से कम 65 बड़े परीक्षा पेपर लीक के मामले सामने आए। इनके कारण कई परीक्षाएं रद्द हुईं या भर्ती प्रक्रिया में देरी हुई। एक अन्य जांच में सात वर्षों के दौरान 70 से अधिक पुष्ट पेपर लीक के मामलों का अनुमान लगाया गया। इनसे 1.7 करोड़ से अधिक अभ्यर्थी प्रभावित हुए। The Indian Express ने दो दशकों से अधिक समय के प्रमुख परीक्षा लीक मामलों का अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि हजारों लोगों की गिरफ्तारी के बावजूद दोषसिद्धि के मामले बहुत कम रहे।
घटनाओं का यह क्रम चिंताजनक है:
- 2015 में व्यापक गड़बड़ी के आरोपों के बाद AIPMT परीक्षा रद्द कर दी गई।
- 2021 में राजस्थान की REET परीक्षा रद्द हुई। इसमें लगभग 16 लाख उम्मीदवार शामिल थे।
- 2024 में लगभग 9 लाख उम्मीदवारों वाली UGC-NET परीक्षा परीक्षा की विश्वसनीयता को लेकर उठे सवालों के बाद एक दिन के भीतर रद्द कर दी गई।
- NEET-UG 2024 में लगभग 24 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए थे। इस परीक्षा से जुड़ा विवाद CBI की जांच और लंबे समय तक चली सुप्रीम कोर्ट की कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचा।
- उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा में भी लगभग 48 लाख लोगों ने आवेदन किया था। पेपर लीक के आरोपों के बाद यह परीक्षा भी रद्द कर दी गई।
इनमें से हर घटना केवल प्रशासनिक विफलता नहीं है। यह उन युवाओं के वर्षों की मेहनत को अनिश्चित बना देती है, जिन्होंने अनुशासित तरीके से तैयारी की होती है। इससे करियर में देरी होती है। कई बार उम्र की सीमा पार हो जाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे सार्वजनिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होता है।गणराज्य अपने युवाओं से यह नहीं कह सकता कि वे और मेहनत करें, जबकि वह यह सुनिश्चित करने में असफल रहे कि उनकी योग्यता को परखने वाली संस्थाएं उनके भरोसे के योग्य हैं।
सार्वजनिक बहस की गुणवत्ता और शिक्षा का संबंध
यह संकट केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। इसका संबंध भारत में सार्वजनिक बहस की गुणवत्ता से भी है।पिछली पीढ़ियों ने संसद में ऐसे बहसों का दौर देखा है, जहां वैचारिक विरोधी भी संवैधानिक तर्क, आर्थिक विचार और कानूनों की गंभीर समीक्षा के आधार पर एक-दूसरे से बहस करते थे। असहमति तीखी होती थी, लेकिन उसमें तर्क की अपेक्षा की जाती थी।आज राजनीतिक संवाद का बड़ा हिस्सा टेलीविजन स्टूडियो और सोशल मीडिया की तेज गति में होता है। यहां सटीकता से अधिक छोटी और तेज बात को महत्व मिलता है। विचार से अधिक दिखावे को महत्व मिलता है। यह केवल भारत की समस्या नहीं है। लेकिन भारत के लिए इसके परिणाम अधिक गंभीर हैं। इसका कारण यह है कि देश का भविष्य अपने युवाओं के बौद्धिक विकास पर बहुत अधिक निर्भर करता है।
विश्वविद्यालयों और छात्रों की भूमिका
विश्वविद्यालयों का ऐतिहासिक महत्व इसी में रहा है कि वे उन कठिन सवालों को उठाते हैं, जो बाद में राष्ट्रीय संकट बन सकते हैं। इसलिए छात्रों को न तो जरूरत से ज्यादा आदर्श बनाकर देखना चाहिए और न ही उन्हें खारिज करना चाहिए। उन्हें सुना जाना चाहिए। उनकी शिकायतों की जांच प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए। उन्हें पारदर्शिता के साथ जवाब दिया जाना चाहिए। राजनीतिक लेबल लगाने के बजाय संस्थागत सुधार के माध्यम से उनकी समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण और भारत की ज्ञान परंपरा
इतिहास हमें इसके लिए कई उदाहरण देता है। जापान ने युद्ध की तबाही के बाद शिक्षा और विज्ञान में लगातार निवेश करके खुद को फिर से खड़ा किया। दक्षिण कोरिया ने शिक्षा और मानव संसाधन पर ध्यान देकर गरीबी से निकलकर तकनीकी शक्ति बनने तक की यात्रा की। सिंगापुर के पास प्राकृतिक संसाधन बहुत कम थे। उसने यह समझा कि उसके नागरिकों की शिक्षा ही उसकी सबसे बड़ी ताकत होगी। इन देशों ने केवल अपनी युवा आबादी के कारण सफलता हासिल नहीं की। उन्होंने ऐसी संस्थाएं बनाईं, जिन पर उनके नागरिकों की आकांक्षाएं भरोसा कर सकें।भारत की विरासत इससे भी समृद्ध है। जिस सभ्यता ने कभी तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे ज्ञान केंद्रों को जन्म दिया, वह यह समझती थी कि शिक्षा केवल आर्थिक समृद्धि का साधन नहीं है। वह सभ्यता की नींव भी है। यह विरासत हमें केवल गर्व नहीं देती। यह हम पर जिम्मेदारी भी डालती है।
बड़े सवाल जो हमें पूछने होंगे
आज भारत के सामने सवाल केवल वर्तमान छात्र आंदोलनों या वर्तमान सरकार से जुड़ा हुआ नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या देश उन संस्थाओं में पर्याप्त भौतिक और नैतिक निवेश कर रहा है, जो उसके भविष्य को तय करेंगी।
- क्या भारत एक वैश्विक ज्ञान शक्ति बनने की आकांक्षा रख सकता है, जबकि छात्र लगातार परीक्षाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हों?
- क्या यह संभव है, जब नियोक्ता स्नातकों की तैयारी और क्षमता पर सवाल उठा रहे हों?
- क्या यह संभव है, जब विश्वविद्यालय शोध के क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हों और सार्वजनिक बहस में तर्क की तुलना में आक्रोश को अधिक महत्व मिल रहा हो?
ये असहज सवाल हैं। लेकिन ये जरूरी सवाल भी हैं।
आगे का रास्ता: भरोसा बहाल करना
एक महान राष्ट्र की पहचान केवल उसकी युवा आबादी की संख्या से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि उसके युवा अपनी संस्थाओं पर कितना भरोसा करते हैं। यदि भारत अपनी जनसांख्यिकीय शक्ति को स्थायी राष्ट्रीय ताकत बनाना चाहता है, तो इसका उत्तर केवल नई नीतियों और घोषणाओं में नहीं है। इसका उत्तर भरोसा बहाल करने में है।इसके लिए जरूरी है:
- पारदर्शी परीक्षाएं
- शिक्षा और शोध में लगातार निवेश
- संस्थाओं की जवाबदेही
- ऐसी सार्वजनिक संस्कृति जो नारे से अधिक प्रमाण को और आक्रोश से अधिक तर्क को महत्व दे









