
Bihar News : मुजफ्फरपुर में सोमवार देर रात हजरत अली की शहादत की बरसी पर मातमी मजलिस और जुलूस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर हाजी आशिक हुसैन वक्फ इमामबाड़ा, नई बाजार से ‘साहब-ए-गलीम’ के ताबूत को निकाला गया और मातमी जुलूस शहर की सड़कों से होकर नगर थाना क्षेत्र के कमरा मोहल्ला स्थित रौजाए अमीरिलमोमेनीन तक गया, जहां जुलूस का समापन हुआ।
जुलूस में बड़ी संख्या में शिया और सुन्नी समुदाय के लोग शामिल हुए और उन्होंने मिलकर इस ऐतिहासिक घटना को याद किया।
मौलाना वेकार अहमद रिज़वी ने दी धार्मिक व्याख्या
मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना वेकार अहमद रिज़वी ने कहा कि हजरत अली को पैगंबर मोहम्मद साहब ने अंतिम हज से पहले अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। उन्होंने बताया कि हजरत अली ने अपने जीवन को इस्लाम की रक्षा और कई लड़ाइयों में लश्कर-ए-इस्लाम के कमांडर के रूप में समर्पित कर दिया।
क्यों मनाया जाता है मातमी जुलूस?
मौलाना ने शहादत का ऐतिहासिक विवरण देते हुए कहा कि 19 रमजान 40 हिजरी को इब्ने मुलजिम ने साजिश के तहत फज्र की नमाज के दौरान हजरत अली पर जहरीली तलवार से हमला किया था। दो दिन बाद, 21 रमजान 40 हिजरी को उनकी शहादत हुई। यही घटना हर साल मातमी जुलूस और मजलिस आयोजित करने का कारण बनती है।
मातमी अंजुमनों ने किया नौहा और मातम
जुलूस के दौरान अंजुमने जाफरिया कमरा चंदवारा, अंजुमने हाशिमिया रजिस्टर्ड हसनचक बंगरा और अंजुमने कारवाने केसा ब्रह्मपुरा के सदस्यों ने नौहा पढ़ा और मातम किया। सहभागी “अली मौला, हैदर मौला” के नारों के साथ श्रद्धांजलि अर्पित करते रहे।
इस अवसर पर ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई को भी याद किया गया। मजलिस में शामिल उलेमा और मातमी अंजुमनों के जिम्मेदारों को उनकी तैलीय तस्वीरें स्मृति चिन्ह के रूप में भेंट की गई।
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