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आधी आबादी का सियासी सफर: वोट बैंक से नीति-निर्धारक बनने की लंबी जंग | स्पेशल रिपोर्ट

महिला आरक्षण की बहस के बीच उत्तर प्रदेश की सियासत में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी अब भी सवालों के घेरे में। भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी लंबे समय से एक महत्वपूर्ण सवाल रही है। आबादी में करीब आधी हिस्सेदारी रखने वाली महिलाओं को चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों की रणनीति में खास जगह तो मिलती है, लेकिन जब बात उन्हें सत्ता और नीति-निर्धारण की वास्तविक प्रक्रिया में पर्याप्त हिस्सेदारी देने की आती है, तो तस्वीर उतनी उत्साहजनक नजर नहीं आती।

महिला आरक्षण की बहस के बीच उत्तर प्रदेश की सियासत में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी अब भी सवालों के घेरे में। भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी लंबे समय से एक महत्वपूर्ण सवाल रही है। आबादी में करीब आधी हिस्सेदारी रखने वाली महिलाओं को चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों की रणनीति में खास जगह तो मिलती है, लेकिन जब बात उन्हें सत्ता और नीति-निर्धारण की वास्तविक प्रक्रिया में पर्याप्त हिस्सेदारी देने की आती है, तो तस्वीर उतनी उत्साहजनक नजर नहीं आती।

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ ही ‘नारी शक्ति’, महिला सशक्तिकरण और महिला आरक्षण जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं। संसद से ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित होने के बाद राजनीतिक दलों के लिए महिलाओं के प्रतिनिधित्व का सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल कानून के लागू होने का इंतजार किए बिना अपनी तरफ से महिलाओं को पर्याप्त राजनीतिक हिस्सेदारी देने के लिए तैयार हैं?

दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना फासला?

महिला आरक्षण कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है। हालांकि इसका क्रियान्वयन जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा है। ऐसे में 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में संवैधानिक तौर पर 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण लागू होना मौजूदा व्यवस्था के तहत संभव नहीं दिखता। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल राजनीतिक दलों की स्वेच्छा का है। कानूनी बाध्यता न होने के बावजूद कोई भी दल चाहे तो बड़ी संख्या में महिला उम्मीदवारों को टिकट दे सकता है। यही वह कसौटी है जिस पर आने वाले चुनावों में दलों के दावों को परखा जा सकता है।

एक तरफ विपक्षी दल महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता और कल्याणकारी योजनाओं के वादों के जरिए महिला मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ सत्तारूढ़ भाजपा का महिला मोर्चा और उसका बूथ स्तर तक संगठनात्मक नेटवर्क महिला मतदाताओं तक पहुंच बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यानी चुनावी राजनीति में महिलाओं का महत्व लगातार बढ़ रहा है। लेकिन क्या यह बढ़ता महत्व राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भी दिखाई दे रहा है?

उत्तर प्रदेश विधानसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी

उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। मौजूदा विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या करीब 51 है, यानी लगभग 12.6 प्रतिशत। यह आंकड़ा बताता है कि विधानसभा में महिलाओं की भागीदारी अभी भी उस स्तर से काफी दूर है, जिसकी अपेक्षा आधी आबादी के अनुपात में की जा सकती है। और तस्वीर विधान परिषद में और भी सीमित दिखाई देती है। 100 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधान परिषद में महिला सदस्यों की संख्या बेहद कम है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि राज्य की विधायी प्रक्रिया में महिलाओं की आवाज पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व कर रही है या नहीं। यहां केवल संख्या का सवाल नहीं है। सवाल यह भी है कि राजनीतिक दल टिकट वितरण से लेकर संगठनात्मक जिम्मेदारियों और नेतृत्व के अवसरों तक महिलाओं को कितनी जगह देते हैं।

संसद में भी प्रतिनिधित्व की रफ्तार धीमी

उत्तर प्रदेश देश की सबसे अधिक लोकसभा सीटों वाला राज्य है। 2024 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 80 सीटों में से 7 पर महिलाएं निर्वाचित होकर संसद पहुंचीं। यानी उत्तर प्रदेश से चुने गए सांसदों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 8.75 प्रतिशत रही। राष्ट्रीय स्तर पर 18वीं लोकसभा में 543 में से 74 महिलाएं निर्वाचित हुईं। यह कुल सदस्य संख्या का लगभग 13.6 प्रतिशत है। इस तुलना से यह सवाल सामने आता है कि देश के सबसे बड़े राजनीतिक राज्य उत्तर प्रदेश में महिलाओं का संसदीय प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय औसत से भी नीचे क्यों है? राज्यसभा में भी उत्तर प्रदेश से महिला प्रतिनिधित्व सीमित है। इससे यह स्पष्ट होता है कि लोकसभा और विधानसभा की तरह उच्च सदन में भी महिलाओं की राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने की चुनौती बनी हुई है।

सिर्फ राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी?

महिलाओं के कम राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए राजनीतिक दलों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। टिकट वितरण में ‘जिताऊ उम्मीदवार’, जातीय समीकरण, स्थानीय संगठन और चुनावी गणित जैसे तर्क अक्सर महत्वपूर्ण माने जाते हैं। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर व्यापक और निरंतर सामाजिक दबाव की कमी भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। महिला मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है और कई चुनावों में उनका मतदान प्रतिशत भी निर्णायक रहा है। इसके बावजूद राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर महिलाओं की सामूहिक मांग चुनावी विमर्श का उतना बड़ा हिस्सा नहीं बन पाती, जितना रोजगार, महंगाई, सुरक्षा, राशन और कल्याणकारी योजनाएं बनती हैं।

सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दलों से महिला मतदाताओं को यह भी पूछना चाहिए कि उनकी राजनीतिक भागीदारी कितनी बढ़ी?

महिला वोटर और महिला लीडर के बीच का अंतर

भारतीय चुनावी राजनीति में महिला मतदाता अब एक महत्वपूर्ण राजनीतिक समूह हैं। राजनीतिक दल महिलाओं को ध्यान में रखकर अलग-अलग कल्याणकारी योजनाएं, वित्तीय सहायता, मुफ्त सुविधाएं और सुरक्षा से जुड़े वादे करते हैं। लेकिन महिला मतदाता की राजनीतिक ताकत और महिला नेता की राजनीतिक हिस्सेदारी दो अलग-अलग विषय हैं। एक ओर महिलाएं बड़ी संख्या में मतदान करती हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों के टिकट वितरण में उनका प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत सीमित रहता है। यही विरोधाभास लोकतंत्र के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—क्या महिलाओं को केवल एक महत्वपूर्ण वोट बैंक के रूप में देखा जाएगा या उन्हें सत्ता और नीति-निर्धारण में भी समान भागीदारी मिलेगी?

‘विनबिलिटी’ और जातीय समीकरण की राजनीति

राजनीतिक दलों के सामने चुनाव जीतने की चुनौती वास्तविक है। उम्मीदवार का स्थानीय प्रभाव, संगठनात्मक पकड़, जातीय समीकरण और चुनावी गणित टिकट वितरण में भूमिका निभाते हैं। लेकिन यही वह जगह है जहां महिला उम्मीदवारों की राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल सामने आता है। कई बार महिला उम्मीदवारों को ‘विनबिलिटी’ यानी चुनाव जीतने की क्षमता के आधार पर पीछे कर दिया जाता है। दूसरी ओर, अगर राजनीतिक दल लंबे समय तक पर्याप्त संख्या में महिलाओं को टिकट ही नहीं देंगे, तो उनके लिए चुनावी राजनीति में मजबूत नेतृत्व और संगठनात्मक आधार विकसित करना भी कठिन होगा। इसलिए महिला प्रतिनिधित्व का सवाल केवल टिकटों की संख्या का नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने की प्रक्रिया का भी है।

पंचायत से संसद तक नेतृत्व की चुनौती

महिला आरक्षण का सबसे बड़ा प्रयोग स्थानीय निकायों और पंचायतों के स्तर पर लंबे समय से देखने को मिलता है। बड़ी संख्या में महिलाएं पंचायतों और स्थानीय निकायों में निर्वाचित होती रही हैं। लेकिन कई राज्यों में ‘प्रधान पति’ या महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पुरुष रिश्तेदारों के प्रभाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं। यह स्थिति बताती है कि केवल संवैधानिक या कानूनी आरक्षण पर्याप्त नहीं है। महिला जनप्रतिनिधियों को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने, प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझने और राजनीतिक नेतृत्व विकसित करने के अवसर भी मिलने चाहिए। अगर निर्वाचित महिला प्रतिनिधि की जगह उसका परिवार या कोई पुरुष रिश्तेदार फैसले लेने लगे, तो आरक्षण का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

2027 का चुनाव और महिला प्रतिनिधित्व का सवाल

उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होगा। महिला आरक्षण कानून के पूर्ण क्रियान्वयन में अभी संवैधानिक प्रक्रियाएं जुड़ी हुई हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के पास स्वेच्छा से अधिक महिलाओं को टिकट देने का विकल्प मौजूद है। इसलिए आने वाले चुनाव में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दल महिलाओं को कितनी संख्या में टिकट देते हैं और क्या वे महिलाओं को केवल महिला-केंद्रित योजनाओं के लाभार्थी के रूप में देखते हैं या राजनीतिक नेतृत्व के हिस्सेदार के रूप में भी।
महिला सशक्तिकरण केवल आर्थिक सहायता, सुरक्षा योजनाओं या कल्याणकारी कार्यक्रमों तक सीमित नहीं हो सकता। लोकतंत्र में सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह भी है कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की कितनी भागीदारी है।

आधी आबादी को सिर्फ वोट बैंक तक सीमित नहीं किया जा सकता

भारतीय राजनीति में महिला मतदाताओं का महत्व लगातार बढ़ रहा है। अब अगला सवाल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का है। महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल महिलाओं की नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों, संगठनों और पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की है। राजनीतिक दल यदि वास्तव में महिला सशक्तिकरण को अपनी प्राथमिकता मानते हैं तो उसका प्रभाव टिकट वितरण, संगठनात्मक पदों और नीति-निर्धारण के स्तर पर भी दिखाई देना चाहिए। 2027 में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण कानूनी रूप से लागू हो या न हो, राजनीतिक दलों के पास महिलाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने का अवसर जरूर है। आखिर लोकतंत्र में आधी आबादी की भूमिका केवल वोट डालने तक सीमित नहीं हो सकती। जिस समाज में महिलाएं मतदाता हैं, वहां उनका नीति-निर्धारक और जनप्रतिनिधि के रूप में पर्याप्त प्रतिनिधित्व भी लोकतांत्रिक भागीदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

लेखक- रूद्र प्रताप सिंह, संस्थापक, I-YUVA // राजनीतिक विश्लेषक

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