
UP News : मुजफ्फरनगर की अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या-3/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने बृहस्पतिवार को एनडीपीएस एक्ट के करीब 10 साल पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी अशोक भारत को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त कर दिया। फैसले के दौरान न्यायाधीश ने न्याय व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए।
‘न्यायाधीश का काम न्याय करना है, उसके साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए’
फैसले में न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने लिखा कि न्यायाधीश का दायित्व न्याय करना है, लेकिन यदि न्याय करने वाले के साथ ही अन्याय हो तो उसके लिए न्याय का रास्ता क्या होगा। उन्होंने जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करने वाले न्यायाधीश की स्थिति को लेकर भी सवाल किया।
उन्होंने पूछा कि यदि जिला जज की ओर से ऐसा कोई आदेश दिया जाता है, जिसे अधीनस्थ न्यायाधीश विधि के विपरीत मानता है, तो क्या वह उसे मानने के लिए बाध्य है।
‘तारीख पर तारीख’ का भी दिया उदाहरण
एनडीपीएस एक्ट के इस पुराने मामले में अदालत ने आरोपी अशोक भारत को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर दोषमुक्त कर दिया। फैसले में न्यायाधीश ने फिल्म ‘दामिनी’ के चर्चित ‘तारीख पर तारीख’ संवाद का भी उदाहरण दिया।
अदालत ने कहा कि एक निर्दोष व्यक्ति को न्याय पाने में लंबा समय लग गया। इसी फैसले में न्यायाधीश ने अपनी अदालत से 18 अगस्त को दूसरी अदालत में स्थानांतरित की गई हत्या के मामलों की 97 पत्रावलियों को लेकर भी सवाल उठाए।
18 अगस्त को 97 पत्रावलियों के रिकॉल का उल्लेख
फैसले में कहा गया कि तत्कालीन जनपद न्यायाधीश ने 18 अगस्त को एक ही प्रकार के कुल नौ आदेश पारित किए थे। इन आदेशों के जरिए अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/एफटीसी कोर्ट संख्या-3, मुजफ्फरनगर में लंबित 97 पत्रावलियों को विधि के अनुसार निस्तारण के लिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मुजफ्फरनगर की अदालत में रिकॉल किया गया था।
रिटायरमेंट से 13 दिन पहले कार्रवाई पर सवाल
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने फैसले में उल्लेख किया कि 97 पत्रावलियों को तत्कालीन जनपद न्यायाधीश ने अपने रिटायरमेंट से महज 13 दिन पहले अपने न्यायालय में रिकॉल किया था। फैसले के मुताबिक, इन पत्रावलियों को वापस बुलाने का कोई कारण भी आदेशों में नहीं बताया गया।
इसी कार्रवाई का हवाला देते हुए न्यायाधीश ने जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण और ऐसे आदेशों को लेकर सवाल उठाए, जिन्हें वह कानून के अनुरूप नहीं मानते हैं।
155 दिनों में 10 मामलों में 23 दोषियों को फांसी की सजा
फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर के कार्यकाल में छह अप्रैल से सात सितंबर तक 155 दिनों के दौरान 10 मामलों में 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई है। इसे मुजफ्फरनगर में न्यायालय की स्थापना के 70 साल के इतिहास में एक रिकॉर्ड के तौर पर बताया गया है।
मुजफ्फरनगर में 12 अप्रैल 1956 को मेरठ से विभाजन के बाद अस्थायी न्यायालय की शुरुआत हुई थी। इसके बाद 14 जुलाई 1958 को यहां स्थायी न्यायालय ने काम शुरू किया। इसी न्यायिक इतिहास के बीच छह अप्रैल से सात सितंबर तक 155 दिनों की अवधि में फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने कई महत्वपूर्ण मामलों में फैसले सुनाए। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 10 मामलों में अब तक 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है।
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