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महाराष्ट्र की महायुति सरकार में ऑडियो विवाद और मंत्रालयों पर खींचतान, गठबंधन के भीतर बढ़ी सियासी हलचल

Maharashtra Politics : महाराष्ट्र में महायुति सरकार भले ही सत्ता में मजबूत दिखाई दे रही हो, लेकिन गठबंधन के भीतर कई मुद्दों पर खींचतान की चर्चा तेज है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व को लेकर बयानबाजी, अजित पवार गुट की वित्त विभाग पर दावेदारी और सहयोगी दलों के बीच क्षेत्रीय टकराव ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है. सवाल यह है कि क्या ये सामान्य गठबंधन संबंधी मतभेद हैं या सत्ता में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश?

मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे पाटिल की ओर से सामने लाई गई कथित ऑडियो क्लिप ने विवाद खड़ा कर दिया. इसमें एकनाथ शिंदे से जुड़े कथित 500 करोड़ रुपये के लेन-देन का दावा किया गया. साथ ही, भाजपा की सोशल मीडिया इकाई से जुड़े कुछ लोगों पर आंदोलन को कमजोर करने की कथित साजिश के आरोप भी लगे. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित करने के निर्देश दिए. हालांकि, इन आरोपों की सत्यता जांच के नतीजों से ही स्पष्ट होगी.

शिंदे को भविष्य का सीएम बताने पर बहस तेज

दशहरा रैली के दौरान शिवसेना के शिंदे गुट के कुछ नेताओं ने एकनाथ शिंदे को महाराष्ट्र का भविष्य का मुख्यमंत्री बताया. रामदास कदम और गुलाबराव पाटिल जैसे नेताओं के बयानों को राजनीतिक हलकों में नेतृत्व को लेकर संदेश के रूप में देखा गया. इससे मुख्यमंत्री पद को लेकर भविष्य की संभावनाओं पर बहस तेज हुई है, हालांकि किसी नेतृत्व परिवर्तन की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है.

कोंकण से विधान परिषद तक टकराव

कोंकण क्षेत्र में शिवसेना और अजित पवार गुट के नेताओं के बीच संरक्षक मंत्री पद, विकास निधि और स्थानीय राजनीतिक प्रभाव को लेकर मतभेद सामने आने की चर्चा है. दूसरी ओर, पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा और शिंदे गुट के उम्मीदवारों के आमने-सामने आने की घटना ने गठबंधन के भीतर चुनावी तालमेल पर सवाल खड़े किए.

अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी ने वित्त विभाग को लेकर अपनी मांग फिर उठाई है. सुनेत्रा पवार के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल की मुख्यमंत्री फडणवीस से मुलाकात और छगन भुजबल की सकारात्मक प्रतिक्रिया संबंधी टिप्पणी ने इस मुद्दे को चर्चा में ला दिया.

फिलहाल इन घटनाओं से महायुति सरकार के तत्काल संकट में होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता. लेकिन नेतृत्व, मंत्रालयों और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर सामने आ रहे मतभेद गठबंधन के भीतर सत्ता संतुलन की अहमियत जरूर दिखाते हैं. अब नजर संभावित मंत्रिमंडल विस्तार और विभागों के बंटवारे पर रहेगी.

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