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यूजीसी नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, सुनवाई के लिए सीजेआई ने जताई सहमति

UGC New Rule : यूजीसी यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के नए नियमों को लेकर सवर्णों का विरोध जारी है। इस बिल को वापस लेने या इसमें जनरल कैटेगरी के लिए भी अधिकार शामिल करने की लगातार मांग की जा रही है। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गया है, जहां यूजीसी नियमों के खिलाफ याचिका दायर की गई है। दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि ‘इसमें जनरल क्लास के खिलाफ षणयंत्र या भेदभाव किया जा सकता है’। वहीं इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट भी सुनवाई के लिए राजी हो गई है। हालांकि अभी कोई तारीख तय नहीं हुई है, लेकिन वो भी बहुत जल्द निर्धारित होने की संभावना है।

याचिका में लगाए गए आरोप

बता दें यह मामला राहुल देवन और अन्य बनाम केंद्र सरकार है। बार एंड बेंच की खबर के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्याकांत की बेंच के सामने वकील ने कहा कि, ‘केंद्र सरकार द्वारा जो यूजीसी बिल लाई गई है, इसमें जनरल क्लास के खिलाफ भेदभाव की संभावना है। इन नियमों का फायदा उठाकर कोई भी छात्र सवर्णों को फंसाने के लिए झूठी शिकायत कर सकता है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा सिर्फ एससी/एसटी/ओबीसी तक सीमित है। इससे जनरल कैटेगरी के छात्र शिकायत निवारण तंत्र से वंचित रह सकते हैं। इस पर सीजेआई ने जवाब दिया, ‘हमें पता है क्या हो रहा है। सुनिश्चित करें कि कमियां दूर कर ली जाएं। हम इसे लिस्ट करेंगे।

नियमों में किए गए इन बदलावों के कारण बढ़ा विवाद

भेदभाव के दायरे को सख्त और विस्तृत करना

दरअसल, 2026 के नियमों में भेदभाव की परिभाषा को ज्यादा सख्त और विस्तृत किया गया है, जो 2012 के नियमों की तुलना में अधिक व्यापक है। इसके साथ ही जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा का दायरा बढ़ाया गया है, जिसमें अब एससी, एसटी के अलावा ओबीसी के छात्रों और कर्मचारियों को भी शामिल किया गया है।

झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान हटाना

बता दें कि साल 2012 के नियमों में झूठी शिकायतों पर जुर्माने और दंड के प्रावधान थे, लेकिन 2026 के नियमों में इसे हटा दिया गया है ताकि असली पीड़ित शिकायत करने से न डरें। इसका विरोध इसलिए किया जा रहा है क्योंकि जिनके पक्ष में ये नियम लगाए गए हैं वो इसका गलत इस्तेमाल कर सवर्णों को फंसा सकते हैं।

सख्त निगरानी तंत्र व संस्थानों पर जिम्मेदारी

इसके अलावा नए नियम में ये भी कहा गया है कि प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को समता दस्ते और समता दूत की नियुक्ति करनी होगी। साथ ही भेदभाव के मामलों पर सात दिनों के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट देनी होगी। दंड विधि के तहत मामला बनता है तो पुलिस को तत्काल सूचित किया जाएगा। साथ ही यदि संस्थान नियमों का पालन नहीं करते हैं तो यूजीसी दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है, जैसे डिग्री, वित्तीय मदद या ऑनलाइन कोर्सों पर रोक लगाना।

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