
JNU Protest : जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में 5 जनवरी 2020 की हिंसा की छठी बरसी पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान छात्रों द्वारा प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाए गए। इस घटना ने एक बार फिर लोकतंत्र की अभिव्यक्ति और उसके अधिकारों को लेकर बहस छेड़ दी है। छात्रों की यह नारेबाजी प्रशासन के लिए चिंता का विषय बन गई, जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने तुरंत कदम उठाए।
प्रशासन की कड़ी प्रतिक्रिया
जेएनयू प्रशासन ने अपने आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया कि ऐसे नारे विश्वविद्यालय की आचार संहिता का उल्लंघन हैं और इसे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रशासन ने घोषणा की कि इस घटना में शामिल छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी, जिसमें तत्काल सस्पेंशन और निष्कासन शामिल है। इसके साथ ही पुलिस को प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का आदेश भी दिया गया। प्रशासन ने “नफरत की प्रयोगशाला” बनने से बचने की बात कही और इस प्रकार की गतिविधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति अपनाने का फैसला लिया।
नारेबाजी का राजनीतिक और कानूनी प्रभाव
इस घटना को केवल राजनीतिक विरोध नहीं माना जा सकता। प्रशासन ने इसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अनादर और विश्वविद्यालय की आचार संहिता का उल्लंघन बताया। छात्रों की सक्रियता को अब कानूनी प्रक्रियाओं के तहत नियंत्रित किया जाएगा, जो आगे चलकर विश्वविद्यालय की छवि पर भी असर डाल सकता है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके सीमाएं
जेएनयू में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्व हमेशा से रहा है, लेकिन प्रशासन ने यह स्पष्ट किया कि इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग किसी भी तरह की हिंसा या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता। प्रशासन का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है, लेकिन इसे किसी भी कीमत पर अराजकता और हिंसा की अनुमति नहीं दी जा सकती।
छात्रों और प्रशासन के बीच बढ़ता तनाव
यह घटना दर्शाती है कि जेएनयू में छात्र राजनीति अब एक नए मोड़ पर पहुंच चुकी है। विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच संवाद अब पूरी तरह कानूनी और अनुशासनात्मक प्रक्रियाओं में बदल चुका है। छात्र राजनीति का यह रूप अब केवल विचारों के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई से भी जुड़ गया है।
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