OBC Reservation : अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने के नियमों को लेकर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है. अदालत ने केंद्र की उस अर्जी को खारिज कर दिया है, जिसमें 11 मार्च 2026 को दिए गए फैसले को लागू करने के लिए अतिरिक्त समय और UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 में छूट देने की मांग की गई थी. इस फैसले के बाद क्रीमी लेयर निर्धारित करने के नियमों को लेकर केंद्र सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि OBC क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता. इसके लिए उनके पद और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना जरूरी है. अदालत ने केंद्र सरकार के 2004 के आदेश को भी गलत माना था.
केंद्र सरकार ने क्यों मांगी थी राहत?
केंद्र सरकार ने अगस्त में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर फैसले पर स्पष्टीकरण और इसे लागू करने के लिए राहत मांगी थी. सरकार का तर्क था कि नए नियमों को अचानक लागू करने से प्रशासनिक स्तर पर कई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं.
सरकार के मुताबिक, इससे सिविल सेवा परीक्षा 2025 के कैडर और सेवाओं का आवंटन, प्रशिक्षण और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं. इसी वजह से 2025 और 2026 की UPSC परीक्षाओं को नए नियमों से छूट देने की मांग की गई थी.
3.70 लाख नियुक्तियों पर विवाद की आशंका
केंद्र ने अपनी अर्जी में बताया था कि 2016 के बाद केंद्र सरकार, रेलवे, बैंक, अर्धसैनिक बलों और विश्वविद्यालयों में करीब 3 लाख 70 हजार OBC नियुक्तियां हुई हैं. यदि नए फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया तो बड़ी संख्या में विवाद और मुकदमे सामने आ सकते हैं.
सरकार ने यह भी कहा था कि राज्यों से बातचीत और बड़ी संख्या में सरकारी संस्थानों को देखते हुए नियम लागू करने में करीब दो साल लग सकते हैं. निजी क्षेत्र के पदों को सरकारी पदों के बराबर मानने की प्रक्रिया में भी समय लगने की बात कही गई थी.
2004 के आदेश पर भी उठे थे सवाल
आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के 2004 के आदेश को गलत माना था. इस आदेश के तहत PSU, बैंक और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों की क्रीमी लेयर स्थिति वेतन से होने वाली आय के आधार पर तय की जाती थी, जबकि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए उनके माता-पिता के पद और सेवा की स्थिति को आधार बनाया जाता था.
अदालत ने इस अंतर को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में दिए गए समानता के अधिकार के खिलाफ माना था.
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