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CJP नेता सौरव–आशुतोष को 7 दिन बाद जमानत, तिरंगा लेकर प्रदर्शन करने पहुंचे थे CJP नेता, जानिए पूरा मामला

Jantar Mantar Protest : कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली की स्पेशल कोर्ट से सात दिन बाद जमानत मिल गई है। दोनों को 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कानूनी प्रक्रिया के तहत रिवीजन पिटीशन दाखिल करने का विकल्प अपनाने को कहा था।

Jantar Mantar Protest : कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली की स्पेशल कोर्ट से जमानत मिल गई है। दोनों नेताओं को 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। करीब सात दिन बाद उन्हें अदालत से राहत मिली है। दोनों नेता अपने 8 से 10 समर्थकों के साथ तिरंगा लेकर प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे थे। उस समय जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पर रोक लगाई गई थी।

प्रदर्शन पर रोक के बावजूद पहुंचे थे जंतर-मंतर

जानकारी के मुताबिक, 12 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके अगले दिन सौरव दास और आशुतोष रांका समर्थकों के साथ वहां पहुंचे। पुलिस ने नियमों के उल्लंघन के आरोप में उन्हें हिरासत में लिया और बाद में पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

इसके बाद 19 अक्टूबर को उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई थी। दोनों नेताओं ने इस कार्रवाई को चुनौती देने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका पर दखल देने से किया इनकार

बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले में सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को पहले मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ उपलब्ध कानूनी विकल्प का इस्तेमाल करना चाहिए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि जब निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने के लिए रिवीजन पिटीशन का विकल्प उपलब्ध है, तो सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में याचिका क्यों दाखिल की गई। अदालत ने दोनों नेताओं को मौजूदा याचिकाएं वापस लेकर उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाने का विकल्प दिया। इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी याचिकाएं वापस ले लीं।

क्या है अनुच्छेद 226 और रिवीजन पिटीशन का अंतर?

संविधान का अनुच्छेद 226 हाईकोर्ट को मौलिक अधिकारों सहित अन्य कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है। वहीं, रिवीजन पिटीशन के जरिए किसी निचली अदालत के आदेश को निर्धारित कानूनी आधारों पर चुनौती दी जा सकती है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को पहले उपलब्ध वैधानिक विकल्प अपनाने का निर्देश दिया। इसके बाद दोनों नेताओं को स्पेशल कोर्ट से जमानत मिल गई।

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