Viral News : झीरम घाटी में हुए भीषण हमले को अब 13 साल गुजर चुके हैं, लेकिन यहां के लोगों के दिलों में आज भी उसका डर और दर्द बना हुआ है. केंद्र सरकार ने देश से नक्सलवाद खत्म करने के लिए 31 मार्च तक की समयसीमा तय की है, फिर भी जमीनी हालात पूरी तरह सामान्य नजर नहीं आते.
25 मई 2013 को बस्तर के दरभा इलाके में स्थित झीरम घाटी खून से रंग गई थी. माओवादियों ने कांग्रेस नेताओं के काफिले पर घात लगाकर हमला किया था, जिसमें 32 लोगों की मौत हो गई थी. इस हमले में राज्य के वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा, नंद कुमार पटेल और विद्या चरण शुक्ल भी शामिल थे.
रणनीति में बदलाव से बदले हालात
यह घटना केवल एक हिंसक हमला नहीं था, बल्कि माओवादियों की ताकत का बड़ा प्रदर्शन भी था. उस समय बस्तर क्षेत्र रेड कॉरिडोर का अहम हिस्सा माना जाता था. घने जंगल, खराब सड़कें और प्रशासन की सीमित पहुंच के चलते नक्सलियों को खुलकर सक्रिय रहने का मौका मिला हुआ था.
हमले के बाद सरकार और सुरक्षा बलों ने अपनी रणनीति में बदलाव किया. बस्तर में सुरक्षा कैंप बढ़ाए गए, सड़कों का निर्माण तेज किया गया और लगातार अभियान चलाए गए. इसका असर यह हुआ कि 2026 तक हालात में काफी सुधार देखने को मिला. अब कई इलाकों में सुरक्षा बलों की पकड़ मजबूत हुई है और बड़े हमलों में कमी आई है.
सुधार के बावजूद चुनौतियां बरकरार
इसके बावजूद स्थिति पूरी तरह सरल नहीं हुई है. झीरम घाटी और आसपास के गांवों में आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. कई जगह सड़कें अधूरी हैं, स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं और पानी-बिजली की दिक्कत बनी हुई है. स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जैसा डर तो कम हुआ है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ.
हमले के निशान आज भी मौजूद
बता दें कि घाटी में आज भी उस हमले के निशान मौजूद हैं. सड़क किनारे बना शहीद स्मारक और जंगल में पड़ा जंग लगा वाहन का दरवाजा उस दिन की भयावहता की याद दिलाते हैं. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, इस हमले के लिए जिम्मेदार दरभा डिवीजन कमेटी को काफी हद तक खत्म कर दिया गया है. कई माओवादी मारे गए, गिरफ्तार किए गए या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया.
फिर भी, 13 साल बाद भी इस मामले की जांच पूरी नहीं हो पाई है. नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन और अन्य एजेंसियों ने जांच की, लेकिन साजिश की पूरी तस्वीर अब तक सामने नहीं आ सकी है.
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