
Period Leave Appeal : महिलाओ को हर महीने लगभग 5 दिन मासिक धर्म के दौरान दर्द से गुजरना पड़ता है। ऐसे में उनके महिलाओं के लिए काम करना बेहद मुश्किल हो जाता है जो वर्किंग हैं। इसके मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट में मासिक धर्म के दौरान विशेष छुट्टी (मेनस्ट्रुअल लीव) को लेकर देशव्यापी नीति बनाने की मांग की गई थी। जिस पर आज यानी शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई करने से ये कहते हुए इनकार कर दिया कि ऐसे में महिलाओं के रोजगार के अवसरों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
पीरियड्स लीव अनिवार्य होने से नौकरी पर असर
इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि ऐसी याचिकाएं कई बार अनजाने में महिलाओं को कमजोर दिखाने या उनके बारे में गलत धारणाओं को बढ़ावा देने का कारण बन सकती हैं। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि मासिक धर्म को महिलाओं के लिए किसी नकारात्मक स्थिति के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। यदि इस तरह की छुट्टी को अनिवार्य बनाया गया, तो इसका महिलाओं के रोजगार के अवसरों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं संस्थान – SC
पीठ ने कहा कि यह विषय एक सकारात्मक अधिकार से जुड़ा हो सकता है, लेकिन इस बात पर भी विचार करना होगा कि नियोक्ताओं को यदि कानूनी रूप से सवेतन छुट्टी देना अनिवार्य कर दिया गया तो उसके क्या प्रभाव होंगे। अदालत ने आशंका जताई कि ऐसी स्थिति में कुछ संस्थान महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं, जिससे उनके करियर पर असर पड़ सकता है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित विभाग या प्राधिकरण इस विषय पर विचार कर सकते हैं और सभी हितधारकों से चर्चा के बाद मासिक धर्म अवकाश को लेकर किसी नीति की संभावना का अध्ययन कर सकते हैं।
शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दायर की थी याचिका
इस मामले में याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दायर की थी। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने अदालत को बताया कि कुछ राज्यों और संस्थानों ने अपने स्तर पर मासिक धर्म अवकाश की सुविधा शुरू की है। उन्होंने केरल के कुछ स्कूलों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां छात्राओं को इस तरह की छूट दी जाती है और कई निजी कंपनियां भी स्वेच्छा से कर्मचारियों को ऐसी छुट्टी दे रही हैं।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि कोई संस्था स्वेच्छा से यह सुविधा देती है तो यह अच्छी पहल है। लेकिन यदि इसे कानून के जरिए अनिवार्य बना दिया गया, तो इससे महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं। अदालत ने अंततः इस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
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