Punjab News : हर साल सर्दियां शुरू होते ही दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को लेकर बहस तेज हो जाती है। हवा जहरीली होने लगती है तो पराली जलाने के मुद्दे पर सबसे पहले पंजाब का नाम चर्चा में आ जाता है। लेकिन अब सरकारी आंकड़े इस पुरानी बहस की बदलती तस्वीर सामने रख रहे हैं। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार ने पिछले चार वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी कमी दर्ज की है। दूसरी ओर, बीजेपी शासित मध्य प्रदेश में पराली जलाने की बढ़ती घटनाओं ने केंद्र और राज्य सरकार की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पंजाब में यह गिरावट किसानों की भागीदारी
पंजाब कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में 2022 में पराली जलाने की 49,922 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जो 2025 में घटकर महज 5,114 रह गईं। और 2026 में अभी तक सिर्फ 474 घटनाएं भी सामने आई है। यानी लगभग 93 प्रतिशत से भी ज्यादा की गिरावट। यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है, जब पराली प्रबंधन देश की सबसे बड़ी पर्यावरणीय और कृषि संबंधी चुनौतियों में शामिल है। पंजाब में यह गिरावट किसानों की भागीदारी, आधुनिक कृषि मशीनों की बढ़ती उपलब्धता और भगवंत मान सरकार की ओर से लागू की गई सब्सिडी योजनाओं के बीच दर्ज हुई है।
पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं कम
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस पंजाब को वर्षों तक पराली जलाने के मुद्दे पर राजनीतिक आलोचना का सामना करना पड़ा, वहां घटनाएं तेजी से घटी हैं, जबकि बीजेपी शासित राज्य मध्य प्रदेश में इसके उलट रुझान दिखाई दे रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में 2021 के दौरान पराली जलाने की 8,160 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जो 2022 में बढ़कर 11,737, वर्ष 2023 में 12,500 और 2024 में 16,360 तक पहुंच गईं। वर्ष 2025 में मध्य प्रदेश में 17,067 घटनाएं दर्ज हुईं। यानी जहां पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं लगातार कम हुईं, वहीं मध्य प्रदेश में इनकी संख्या बढ़ती चली गई।
अब सवाल यह है कि जब पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में इतनी बड़ी गिरावट संभव है, तो मध्य प्रदेश में लगातार बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? क्या केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार सभी राज्यों में पराली प्रबंधन की योजनाओं की प्रभावशीलता का समान रूप से मूल्यांकन कर रही है? और क्या राष्ट्रीय स्तर पर पराली के मुद्दे पर होने वाली राजनीतिक बहस में सभी राज्यों के आंकड़ों को बराबर महत्व दिया जा रहा है?
पंजाब में 88, उत्तर प्रदेश में 65 घटनाएं
इस साल के शुरुआती आंकड़े भी इसी अंतर की ओर इशारा करते हैं। वहीं, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के CREAMS कार्यक्रम द्वारा 6 अक्टूबर 2026 को जारी बुलेटिन के अनुसार, 15 सितंबर से 6 अक्टूबर के बीच सात राज्यों में पराली जलाने की कुल 287 घटनाएं दर्ज हुईं। इनमें सबसे ज्यादा 118 घटनाएं मध्य प्रदेश में दर्ज की गईं, जबकि पंजाब में 88, उत्तर प्रदेश में 65 घटनाएं सामने आईं।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि के दौरान पंजाब में किसी भी दिन पराली जलाने की घटनाएं दहाई के आंकड़े तक नहीं पहुंचीं, जबकि मध्य प्रदेश में पांच दिन ऐसे रहे जब घटनाओं की संख्या दहाई में दर्ज हुई। पंजाब के लिए यह पिछले सात वर्षों की समान शुरुआती अवधि के मुकाबले सबसे कम आंकड़ा बताया गया है, जबकि मध्य प्रदेश में इसी अवधि के लिए सबसे ज्यादा घटनाएं दर्ज हुईं। हालांकि बादलों के कारण कुछ इलाकों में उपग्रह से आग की पहचान प्रभावित होने की बात भी बुलेटिन में कही गई है।
कृषि मशीनों पर भारी सब्सिडी देने की नीति
पिछले साल के पूरे निगरानी सीजन के आंकड़े देखें तो मध्य प्रदेश में स्थिति और चिंताजनक दिखाई देती है। वर्ष 2025 में छह राज्यों में पराली जलाने की कुल 33,028 घटनाएं दर्ज हुई थीं। इनमें अकेले मध्य प्रदेश में 17,067 घटनाएं हुईं, जो कुल मामलों के 50 प्रतिशत से अधिक थीं। इसके मुकाबले उत्तर प्रदेश में 7,290 और पंजाब में 5,114 घटनाएं दर्ज हुईं। पंजाब में आए बदलाव के पीछे सरकार द्वारा किसानों को उपलब्ध कराए जा रहे विकल्पों की महत्वपूर्ण भूमिका है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में राज्य सरकार ने पराली प्रबंधन के लिए आधुनिक कृषि मशीनों पर भारी सब्सिडी देने की नीति अपनाई है। सरकार का जोर इस बात पर रहा है कि किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए केवल जुर्माने और कानूनी कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय उन्हें खेतों में काम आने वाले व्यावहारिक साधन भी उपलब्ध कराए जाएं।
पंजाब के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां के अनुसार, 2026 के सीजन में किसानों ने 21,155 फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें खरीदी हैं। इनमें सबसे अधिक 14,384 सुपर सीडर शामिल हैं। इसके अलावा 1,721 मल्चर, 1,346 हाइड्रोलिक रिवर्सिबल एमबी प्लाऊ, 1,123 जीरो टिल ड्रिल, 927 बेलिंग मशीनें और 874 स्ट्रॉ रेक खरीदी गई हैं। इन मशीनों के जरिए किसानों को पराली जलाए बिना अगली फसल की बुवाई करने और फसल अवशेषों का दूसरे कार्यों में उपयोग करने की सुविधा मिल रही है।
किसानों को भी आधुनिक मशीनों की सुविधा
सरकार व्यक्तिगत किसानों को कृषि मशीनों पर 50 प्रतिशत से ज्यादा सब्सिडी दे रही है, जबकि कस्टम हायरिंग सेंटरों, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और पंचायतों को 80 प्रतिशत तक सब्सिडी उपलब्ध कराई जा रही है। इस व्यवस्था का उद्देश्य उन छोटे और सीमांत किसानों को भी आधुनिक मशीनों की सुविधा देना है, जो अपने स्तर पर महंगी मशीनें खरीदने में सक्षम नहीं हैं।
धान की कटाई और गेहूं की बुवाई में कम समय
दरअसल, पंजाब के किसानों के सामने पराली जलाने की समस्या सिर्फ पर्यावरण से जुड़ी नहीं रही है। धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच बहुत कम समय मिलता है। खेतों से पराली हटाने में मशीनों, मजदूरी और परिवहन का अतिरिक्त खर्च आता है। छोटे किसानों के लिए यह खर्च उठाना आसान नहीं होता। ऐसे में पराली जलाने की घटनाओं को केवल किसानों की लापरवाही के रूप में देखना समस्या की वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज करना होगा।
भगवंत मान सरकार की नीति में इसी आर्थिक और व्यावहारिक चुनौती को ध्यान में रखते हुए मशीनों पर सब्सिडी, सामूहिक मशीन केंद्रों और जागरूकता अभियानों को महत्व दिया गया है। किसानों को पराली जलाने के नुकसान समझाने के साथ यह भी बताया जा रहा है कि फसल अवशेषों का इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने, अगली फसल की बुवाई और जैव ऊर्जा उत्पादन में किस तरह किया जा सकता है।
395 करोड़ रुपये की सहायता वितरित की गई
पंजाब सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पराली प्रबंधन की 600 करोड़ रुपये की कार्ययोजना भी तैयार की है। इसके तहत कृषि मशीनों की उपलब्धता बढ़ाने, किसानों को तकनीकी सहायता देने और फसल अवशेषों के वैकल्पिक उपयोग को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार की ओर से साझा जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2025 में भी CRM मशीनरी के लिए लगभग 395 करोड़ रुपये की सहायता वितरित की गई थी, जिससे हजारों किसानों और संस्थाओं को लाभ पहुंचा।
पराली को किसानों की अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनाने के प्रयास भी सामने आ रहे हैं। पंजाब में कुछ किसान पराली को इकट्ठा करके बायोगैस और बायो-CNG परियोजनाओं के लिए बेच रहे हैं। संगरूर के एक किसान द्वारा लगभग 12 हजार क्विंटल पराली बेचकर करीब 16 लाख रुपये की आय अर्जित करने का उदाहरण भी सामने आया है। हालांकि ऐसी कमाई बाजार, पराली की मात्रा, परिवहन लागत और खरीदारों की उपलब्धता पर निर्भर करती है, लेकिन इससे फसल अवशेषों के आर्थिक उपयोग की संभावनाएं जरूर दिखाई देती हैं।
पराली जलाने की घटनाओं में 93 प्रतिशत की कमी
पंजाब में इस बदलाव का श्रेय केवल सरकारी मशीनरी को देना भी पर्याप्त नहीं होगा। राज्य के उन हजारों किसानों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जिन्होंने अपनी खेती के पुराने तौर-तरीकों में बदलाव किया और पराली जलाने के बजाय आधुनिक मशीनों तथा वैकल्पिक प्रबंधन के उपाय अपनाए। किसानों के सहयोग के बिना किसी भी सरकारी योजना का खेतों तक प्रभावी ढंग से पहुंचना संभव नहीं है।
यही कारण है कि पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में लगभग 93 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट को सरकार की नीतियों और किसानों के साझा प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में शुरू किए गए कार्यक्रमों ने किसानों के सामने विकल्प बढ़ाए हैं और राज्य में पराली प्रबंधन को कृषि नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
सभी संबंधित राज्यों की जवाबदेही जरूरी है
दूसरी ओर, मध्य प्रदेश में लगातार बढ़ते मामलों ने बीजेपी सरकार की पराली प्रबंधन रणनीति को लेकर सवाल खड़े किए हैं। जब पंजाब में मशीनों की मदद से पराली जलाने की घटनाएं तेजी से कम हो सकती हैं, तो मध्य प्रदेश में ऐसी योजनाओं का विस्तार किस स्तर तक हुआ है? किसानों को मशीनें कितनी आसानी से उपलब्ध हो रही हैं? क्या छोटे किसानों तक सब्सिडी और सामूहिक मशीन केंद्रों की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में पहुंच रही हैं? इन सवालों का जवाब राज्य और केंद्र सरकार, दोनों को देना चाहिए।
केंद्र सरकार के सामने भी चुनौती है कि वह पराली जलाने की समस्या को केवल कुछ राज्यों तक सीमित राजनीतिक बहस के बजाय राष्ट्रीय कृषि और पर्यावरण नीति के रूप में देखे। दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के लिए पराली के अलावा वाहनों, उद्योगों, निर्माण गतिविधियों, धूल और मौसम की परिस्थितियों की भी भूमिका होती है। इसलिए प्रदूषण के वास्तविक कारणों का वैज्ञानिक मूल्यांकन और सभी संबंधित राज्यों की जवाबदेही जरूरी है।
कार्ययोजना और किसानों की सक्रिय भागीदारी
पंजाब में दर्ज गिरावट निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, अब पराली जलाने की समस्या काफी तेजी से लगभग खत्म हो गई है। राज्य में किसानों तक मशीनों की समय पर पहुंच, पराली उठाने और परिवहन की लागत, छोटे किसानों के लिए सहायता तथा फसल अवशेषों की स्थायी खरीद व्यवस्था जैसी चुनौतियों पर लगातार काम किया जा रहा है। इसके बाद पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि पंजाब में पराली प्रबंधन की दिशा में बहुत बड़ा बदलाव आया है। भगवंत मान सरकार की मशीनरी सब्सिडी, वित्तीय कार्ययोजना और किसानों की सक्रिय भागीदारी के बीच पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी दर्ज हुई है।
पंजाब के आंकड़े देते हैं महत्वपूर्ण संदेश
अब असली सवाल यह है कि केंद्र की मोदी सरकार और बीजेपी शासित मध्य प्रदेश इस अनुभव से क्या सीखेंगे? क्या जिन राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं बढ़ रही हैं, वहां किसानों को बेहतर सुविधाएं और आर्थिक सहायता देने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे, या फिर हर सर्दी प्रदूषण बढ़ने के बाद वही पुरानी राजनीतिक बयानबाजी दोहराई जाएगी? पंजाब के आंकड़े एक महत्वपूर्ण संदेश देते हैं कि किसानों को समस्या का हिस्सा मानने के बजाय समाधान में भागीदार बनाया जाए तो बदलाव संभव है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में वास्तविक प्रगति
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की सरकार ने इस दिशा में कई कदम उठाए हैं और पंजाब के किसानों ने भी अपने प्रयासों से इस बदलाव में योगदान दिया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि पराली प्रबंधन के प्रभावी उपाय देश के दूसरे राज्यों तक भी पहुंचें, ताकि किसानों की आर्थिक मुश्किलें कम हों और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में वास्तविक प्रगति हो सके।
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