
Hormuz Strait : पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच घोषित युद्धविराम के तुरंत बाद भारत ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर सीजफायर का स्वागत किया और उम्मीद जताई कि इससे क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में रास्ता खुलेगा। भारत ने एक बार फिर जोर दिया कि किसी भी संघर्ष का समाधान संवाद और कूटनीति के जरिए ही संभव है।
होर्मुज में फंसे भारतीय जहाजों को निकालने की कवायद
सीजफायर के बाद भारत ने ईरान से संपर्क बढ़ाया है ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य के पश्चिमी हिस्से में फंसे अपने जहाजों को सुरक्षित वापस लाया जा सके। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस क्षेत्र में भारत के 16 जहाज मौजूद हैं, जिनमें अधिकतर तेल और गैस से जुड़े हैं। इन जहाजों में करीब दो लाख टन से अधिक एलपीजी भी लदा हुआ है, जो देश के लिए बेहद जरूरी है।
ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता कम होने की उम्मीद
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार की अस्थिरता भारत की ऊर्जा आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डालती है। युद्धविराम के बाद अब स्थिति सामान्य होने की उम्मीद जताई जा रही है।
वैश्विक व्यापार और आपूर्ति पर पड़ा असर
संघर्ष के चलते वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार नेटवर्क प्रभावित हुए थे। भारत ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य में निर्बाध नौवहन बेहद जरूरी है ताकि वैश्विक व्यापार का प्रवाह सामान्य बना रहे।
अमेरिका और यूएई के साथ कूटनीतिक संपर्क तेज
इस बीच भारत ने कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रियता बढ़ा दी है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी 8 से 11 अप्रैल तक अमेरिका दौरे पर हैं, जहां वे ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। वहीं, विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी इस सप्ताहांत संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा पर जाएंगे।
क्षेत्रीय स्थिरता पर भारत का फोकस
सरकारी सूत्रों के अनुसार, ये सभी प्रयास पश्चिम एशिया के देशों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने और क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने की रणनीति का हिस्सा हैं। भारत लंबे समय से शांति, स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता मानता आया है।
सीजफायर से बाजार में स्थिरता की उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि युद्धविराम के बाद व्यापारिक जहाजों की आवाजाही सामान्य होगी और वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौटेगी। इससे भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों को राहत मिलने की संभावना है।
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