Health News : जन्म के बाद शुरुआती कुछ साल बच्चों के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इस समय उनके शरीर और मन की विशेष देखभाल की जरूरत होती है। आयुर्वेद के अनुसार, शिशु की अभ्यंग मालिश यानी तेल से मालिश उनके शारीरिक और मानसिक विकास में अहम भूमिका निभाती है।
जन्म के तुरंत बाद बच्चे का शरीर बहुत नाजुक और संवेदनशील होता है। इसलिए इस समय मालिश करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। आयुर्वेदिक विशेषज्ञ डॉ. चंचल शर्मा (आशा आयुर्वेदा की डायरेक्टर और स्त्री रोग विशेषज्ञ) के अनुसार, शिशु की नियमित तेल मालिश से न केवल उनका शारीरिक विकास होता है, बल्कि भावनात्मक और मानसिक विकास भी तेज होता है।
मालिश के प्रमुख फायदे
वात दोष का संतुलन
जन्म के समय बच्चे के शरीर में वात का प्रभाव अधिक होता है, जिससे कमजोरी या बेचैनी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। सही तरीके से तेल मालिश करने से वात दोष कम होता है और बच्चा अधिक आराम महसूस करता है।
हड्डियां और मांसपेशियां मजबूत
तिल का तेल, नारियल का तेल या सरसों का तेल शिशु की हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत बनाते हैं। मालिश से त्वचा पोषित और मुलायम रहती है, और ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होने से अंगों तक पोषक तत्व आसानी से पहुंचते हैं।
अच्छी नींद और थकान से राहत
नियमित मालिश के बाद बच्चे को गहरी और आरामदायक नींद आती है। पर्याप्त नींद उनके मस्तिष्क के विकास में मदद करती है और भावनात्मक सुरक्षा का अनुभव कराती है, जिससे बच्चे अपने माता-पिता या देखभाल करने वाले से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं।
पाचन और रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार
मालिश शिशु के पाचन तंत्र को मजबूत बनाती है और पेट दर्द, कब्ज या एसिडिटी जैसी समस्याओं से राहत दिलाती है। साथ ही, यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर बच्चे को बीमारियों से लड़ने में मदद करती है।
मालिश करते समय ध्यान देने योग्य बातें
बच्चे की त्वचा बहुत नाजुक होती है, इसलिए ज्यादा दबाव न डालें।
सर्दियों में सरसों या तिल का तेल और गर्मियों में नारियल तेल इस्तेमाल करें।
मालिश के बाद बच्चे को गुनगुने पानी से ही नहलाएं।
किसी भी समस्या के मामले में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
मालिश शुरू करने का सही समय
शिशु की मालिश जन्म के तुरंत बाद नहीं करनी चाहिए। इसे 2-3 सप्ताह के बाद हल्की मालिश के रूप में शुरू किया जा सकता है। जब बच्चा 1 महीने का हो जाए, तब नियमित अभ्यंग मालिश की जा सकती है।
अभ्यंग मालिश भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह शिशु के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास में बहुत फायदेमंद है। इसे नियमित रूप से करना बच्चे के स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन के लिए आवश्यक है।
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