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बुंदेलखंड का रहस्यमयी ‘अबार माता’ मंदिर, हर साल बढ़ती चट्टान बनी आस्था का केंद्र

Chaitra Navratri : चैत्र नवरात्रि के अवसर पर जहां देशभर में देवी पूजा का माहौल बना हुआ है, वहीं बुंदेलखंड क्षेत्र का एक प्राचीन और आस्था से जुड़ा स्थान इन दिनों श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. सागर, छतरपुर और टीकमगढ़ जिलों की सीमाओं के बीच स्थित ‘अबार माता’ धाम अपनी अनोखी मान्यताओं और रहस्यमयी पहलुओं के कारण लोगों के बीच विशेष पहचान रखता है.

इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां मौजूद एक विशाल ग्रेनाइट की चट्टान है, जिसे भक्त देवी का स्वरूप मानते हैं. वहीं, स्थानीय लोगों का कहना है कि यह चट्टान समय के साथ धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही है और वर्तमान में इसकी ऊंचाई करीब 70 फीट के आसपास बताई जाती है. मान्यता है कि हर महाशिवरात्रि पर इसमें बहुत ही सूक्ष्म वृद्धि होती है, जिसे शिव-शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. श्रद्धालु यह भी विश्वास रखते हैं कि इस चट्टान को स्पर्श करने से संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिल सकता है.

भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने दिए दर्शन

इतिहास की दृष्टि से भी यह स्थान काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. कहा जाता है कि महोबा के प्रसिद्ध वीर आल्हा और ऊदल जब एक यात्रा पर थे, तब रास्ते में देर होने पर उन्होंने इसी स्थान पर विश्राम किया और अपनी आराध्य देवी की पूजा की. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें दर्शन दिए, जिसके बाद से यह स्थल ‘अबार माता’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया.

दस्युओं के प्रभाव में रहा यह इलाका

पुराने समय में यह इलाका दस्युओं के प्रभाव में रहा है. ऐसी मान्यता है कि कई कुख्यात डकैत भी यहां आकर गुप्त रूप से पूजा-अर्चना किया करते थे.

मंदिर परिसर में अब देवी के विभिन्न रूपों की मूर्तियां स्थापित की जा चुकी हैं, लेकिन आज भी मुख्य पूजा उसी प्राकृतिक चट्टान की होती है. माना जाता है कि देवी ने दर्शन देने के बाद इसी चट्टान में अपना निवास बना लिया था, इसलिए यहां प्रकृति की पूजा का विशेष महत्व है.

पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं यहां के मेले

नवरात्रि के दौरान इस स्थान पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. खासकर पंचमी और अष्टमी के दिन विशेष पूजा और सजावट की जाती है. इसके अलावा शारदीय नवरात्रि और वैशाख माह में यहां भव्य मेलों का आयोजन होता है, जो पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं.

यह धार्मिक स्थल सागर से लगभग 85 किलोमीटर और शाहगढ़ से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यहां तक पहुंचने के लिए आसपास के प्रमुख शहरों से बस और टैक्सी की सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिससे श्रद्धालुओं को आने-जाने में आसानी होती है.

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