टोक्यो ओलंपिक: ‘सोने’ से चूके रवि दहिया, लेकिन ख़ास है इस ‘चांदी’ की चमक

पहलवान रवि दहिया (नीली कॉस्टयूम में)

टोक्यो: गुरूवार का दिन टोक्यो ओलंपिक में पदकों के लिहाज से बेहद ही ख़ास रहा है। जहां दिन की शुरूआत पुरूष हॉकी ने 41 साल का सुखा खत्म कर के कांस्य जीतकर की थी, वहीं शाम होते-होते पहलवान रवि दहिया ने सिल्वर मेडल हासिल कर पूरी कर दी। हालांकि दहिया ये फाइनल मुकाबला हार गए।

रवि दहिया को टोक्यो ओलंपिक खेलों के पुरुष फ्री स्टाइल कुश्ती के 57 किलोग्राम भार वर्ग के फाइनल में रशियन ओलंपिक कमेटी के खिलाड़ी ज़वूर उगुएव से हार का सामना करना पड़ा।

इस तरह रवि दहिया को सिल्वर मेडल से संतुष्टि करनी पड़ी, वहीं जवूर ने गोल्ड मेडल जीता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रवि दहिया को बधाई देते हुए ट्वीट कर लिखा है, “रवि कुमार दहिया एक उल्लेखनीय पहलवान हैं! उनकी संघर्ष करने की भावना और लगन उत्कृष्ट है। #Tokyo2020 में सिल्वर मेडल जीतने के लिए उन्हें बधाई, भारत को उनकी उपलब्धियों पर बहुत गर्व है।”

फाइनल का ये मुक़ाबला इतना आसान नहीं था। क्योंकि इससे पहले जब भी दोनों खिलाड़ियों का आमना-सामना हुआ है तब रशियन ओलंपिक कमेटी के खिलाड़ी ज़वूर उगुएव दहिया पर भारी पड़े हैं।

26 वर्षीय ज़वूर उगुएव ने साल 2018 और 2019 वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी गोल्ड मेडल जीता है। वहीं, साल 2019 में यूरोपीय खेलों में वह तीसरे पायदान पर रहे।

दहिया और उगुएव का आमने–सामने मुकाबला 2019 वर्ल्ड चैंपियनशिप के दौरान हो चुका है। इस मैच में उगुएव ने 6-4 से दहिया को मात दी थी।

रवि का ओलंपिक तक का सफ़र

हरियाणा के सोनीपत ज़िले के नाहरी गांव में जन्मे रवि आज जिस मुकाम पर पहुंच गए हैं, वहां उन्हें पहुंचने के लिए बीते 13 सालों का समय लगा। जिसके लिए वो दिन रात जुटे रहे।

रवि जिस गांव के रहने वाले हैं, उसकी आबादी कम से कम 15 हज़ार के करीब होगी लेकिन ये गांव एक मायने में ख़ास है क्योंकि यहां से अब तक तीन ओलंपियन निकले हैं।

महावीर सिंह ने 1980 के मॉस्को और 1984 के लॉस एजेंलिस ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया था जबकि अमित दहिया लंदन, 2012 के ओलंपिक खेल का हिस्सा थे।

इस विरासत को रवि दहिया नई ऊंचाईयों तक ले गए हैं। महज 10 साल की उम्र से वो दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में सतपाल के मार्गदर्शन में कुश्ती के गुर सीख रहे हैं।

कॉपी- आरती अग्रावत

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