‘द कश्मीर फाइल्स’ यह फिल्म नहीं बल्कि एक सच्चाई है, कश्मीरी पंडितों की दर्द भरी सच्चाई

द कश्मीर फाइल्स फिल्म

द कश्मीर फाइल्स इन मासूम लोगों की जिंदगी की कहानी है जिसके जीने के अधिकार को इस आजाद भारत में ही छीन लिया गया। वे अपने घर-जमीन छोड़कर खुद के आजाद देश में ही शर्णार्थी बनने पर मजबूर होना पड़ा। यह आवाज है उस सच्चाई की जो घटित हुई लेकिन सेक्युलर कौम के कानों में चीख-पुकार नहीं पहुंच सकी।

आज से 32 साल पहले कश्मीर को हिंदुओं से मुक्त कर दिया गया। लाखों कश्मीरी हिंदू तहस-नहस कर दिए गए। आजाद भारत में 1990 के दशक में हुए इस नरसंहार की कहानी देखकर आपका कलेजा कांप जाएगा। निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने बड़ी हिम्मत के साथ कश्मीर की सच्चाई को दिखाने का प्रयास किया है।

फिल्म में उस क्रूर नरसंहार को दिखाने की कोशिश की गई है जिसमें हिंदुओं को खुलेआम सड़क पर, गलियों में खड़ा करके गोलियों से मौत के घाट उतार दिया गया। द कश्मीर फाइल्स फिल्म में अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिल्म को देखने के बाद दर्शक खुद को रोने से नहीं रोक पाएंगे।

फिल्म में कश्मीर हिंदुओं को जस्टिस देने की बात भी की गई है। यह फिल्म सवाल खड़ा करता है उस सिस्टम पर जो उस दौर में, इस सेक्युलर भारत में खामोश बनकर मौत का तांडव देखती रही। जब 90 करोड़ भारत चैन की नींद सो रहा था तब कश्मीर में मौत का नंगा खेल खेला जा रहा था।

द कश्मीर फाइल्स फिल्म को दर्शक खुद देख रहे हैं। इस फिल्म के लिए किसी प्रकार का प्रोमोशन नहीं किया गया, लेकिन फिर भी फिल्म लोगों को पसंद आ रही है। फिल्म में कश्मीरी पंडितों और हिंदुओं के नरसंहार और पलायन की कहानी को दर्शाया गया है।

कश्मीर में पंडितों-सिखों का कत्लेआम

19 जनवरी 1990 की सर्द सुबह कश्मीर की मस्जिदों से उस रोज अजान के साथ-साथ कुछ और नारे भी सुनाई दिए थे। ‘यहां क्या चलेगा, निजाए-ए-मुस्तफा’, ‘कश्मीर में अगर रहना है, अल्लाहू अकबर कहना है।’

इस ऐलान के बाद सैकड़ों हिंदू घरों में बेचैनी थी। सड़कों पर इस्लाम और पाकिस्तान के पक्ष में नारेबाजी हो रही थी। कई कश्मीरी हिंदु अपनी पुश्तैनी घरों को छोड़कर घाटी से पलायन कर गए। आज 32 साल हो चुके हैं इस घटना को हुए। लेकिन कोई विरोध की आवाज नहीं और न्याय को कोई आश दिखाई पड़ रही है।

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