चारों निगमों को कंगाल कर देगी दिल्ली सरकार की नई आबकारी नीति, सड़क से कोर्ट तक करेंगे विरोध- वी के जाटव

नई दिल्ली: दिल्ली सरकार की 600 वाइन शॉप चला रहे चरों निगम नई आबकारी नीति के खिलाफ बड़े आन्दोलन का आगाज़ करने का मन बना चुके हैं. हाई कोर्ट के आदेश के बाद आबकारी नीति को सार्वजानिक करने से इस मुहीम के अब और तेज़ होने की संभावना हैं. दिल्ली सरकार अनुसूचित जाति, जनजाति ओबीसी कर्मचारी परिसंघ दिल्ली सरकार की इस नई आबकारी नीति का सडक से लेकर कोर्ट तक पुरजोर विरोध करने के लिए विस्तृत रणनीती तैयार कर चुका हैं. दिल्ली परिसंघ जल्द ही बड़े आन्दोलन का आगाज़ करने वाला है. ये जानकारी दिल्ली परिसंघ के संयोजक वी के जाटव ने एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान मंगलवार को दी. इस प्रेस वार्ता में परिसंघ पदाधिकारियों के अलावा 600 शराब की दुकानों को चला रहे चारों निगमों के कर्मचारी प्रतिनिधि भी मौजूद रहे.

परिसंघ के संयोजक वी के जाटव ने दिल्ली सरकार की नई आबकारी नीति को हर तरह से नुकसानदेह बताया और कहा कि दिल्ली सरकार नई नीति को पूर्णरुपेन लागू करती है तो ये न केवल निगम कर्मियों बल्कि पूरी दिल्ली के लिए घातक साबित होगा. दिल्ली सरकार के ये चारों निगम राजस्व के लिए शराब की दुकानों की आमदनी पर निर्भर हैं और ऐसे में हजारों परिवारों पर अस्तित्व बचाने का संकट आ जायेगा. कर्मचारियों को ये डर है कि नई आबकारी नीति के लागू होने पर कर्मचारियों की छंटनी की जाएगी और उनको सरप्लस घोषित कर जबरन वर्तमान निगम से ट्रांसफर कर अन्य निगमों में भेजा जाएगा या (कम्पलसरी) अनिवार्यतः वीआरएस दे दी जाएगी.

दिल्ली पर्यटन, दिल्ली सिविल सप्लाई, दिल्ली कंजूमर एवं दिल्ली औद्योगिक निगम के कर्मचारी प्रतिनिधियों ने अपने संबोधन में कहा कि यदि दिल्ली सरकार 20 फीसद वृद्धि के लिए प्राइवेट प्लेयर्स को दिल्ली में लाना चाहती है तो हम राजस्व में 30 फीसद वृद्धि करके देंगे जिसके लिए अनुकूल वातावरण बनाने की आवश्यकता है. शराब की होम डिलीवरी की योजना का हम स्वागत करते हैं, इससे यकीनन ही राजस्व बढेगा लेकिन इसके लिए सरकारी दुकानों का निजीकरण करने की ज़रूरत नहीं है. दिल्ली में 500 दुकानें सरकारी हैं और हर वर्ष 5 फीसद की बढ़ोतरी के साथ सरकार को हजारों करोड़ का राजस्व प्राप्त होता है इसीलिए अपने कर्मठ कर्मचारियों की निष्ठा पर शक ना किया जाए.

परिसंघ के नेताओं ने कहा कि करोना संकट की वजह से दिल्लीवासी पहले ही भारी दिक्कत में हैं और यदि इन हजारों कर्मचारियों की नौकरियां नहीं रही तो इनके परिवार भुखमरी की कगार पर आ जायेंगे जिसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी. अगर सरकार मानती है कि दिल्ली में 2000 ठिकानों से शराब की अवैध बिक्री होती है तो सरकार, अपने कर्मचारियों को ही कटघरे में खड़ा करने की बजाय डीएम, एसडीएम और दिल्ली पुलिस के ज़रिये कठोर कार्रवाई करें. इस व्यापक निजीकरण नीति के कारण निगमों में तालाबंदी का संकट आ जाएगा क्योंकि आर्थिक रूप से चरमराई व्यवस्था में ये निगम अपने कर्मचारियों को तनख्वाह तक नहीं दे पाएंगे. ऐसी स्थिति में इन चारों निगमों को बंद करना पड़ेगा. इससे भी भयावह स्थिति यह होगी कि विभागों में आरक्षण नीति के द्वारा लाए गए कर्मचारियों की नौकरियां भी जाएंगी और भविष्य में आरक्षण के तहत मिलने वाली नौकरियां समाप्त हो जाएंगी जिससे दिल्ली के अनुसूचित जाति जनजाति एवं ओबीसी समुदाय को भारी नुकसान होगा, सरकार के प्रति आक्रोश उपजेगा और इस वर्ग का विश्वास भी दिल्ली सरकार से उठना शुरू हो जाएगा.

कर्मचारी प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहां कि वर्तमान नीति के तहत सरकार शराब की बिक्री के माध्यम से इन निगमों का आर्थिक सुदृढ़ीकरण करती आई है. अतः इन विभागों में इन कर्मचारियों को वेतन, मेडिकल फैसिलिटी एवम अन्य सुविधाएं दी जाती हैं. इस नई नीति से उत्पन्न आर्थिक संकट के कारण इनके वेतन पर भी असर पड़ेगा और मेडिकल सुविधा भी समाप्त की जा सकती हैं.

वी के जाटव ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नई नीति के तहत इन दुकानों के आवंटन के समय आरक्षण व्यवस्था को लागू करने का कोई प्रावधान नहीं है. हालांकि, दिल्ली सरकार की अनेकों पॉलिसी में आरक्षण की व्यवस्था के तहत आरक्षित समुदाय को हमेशा लाभ मिलता रहा है, इसलिए सरकार इस नीति को संशोधित कर अनुसूचित जाति जनजाति और ओबीसी के 49% फीसद आरक्षण के अनुसार इन दुकानों में आरक्षण सुनिश्चित करें ताकि आरक्षित वर्ग के समुदाय को भी बिजनेस करने का अवसर मिल सके.

•शराब बिक्री आयु 21 वर्ष करने से युवाओं का भविष्य हो जायेगा बर्बाद
•पैदा होगा चारों निगमों के वर्तमान और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के अस्तित्व का संकट
•30 प्रतिशत राजस्व वृद्धि करके दिखा सकते हैं वाइन शॉप कर्मी
•निजी दुकानों के दुष्परिणाम यूपी, राजस्थान, उत्तराखंड में देश देख चुका है

प्राप्त जानकारी के अनुसार, नई नीति के तहत दिल्ली सरकार दिल्ली के सभी एमसीडी वार्ड को मिलाकर 30 ज़ोन बनाना चाहती है और सभी जोन में 27 दुकान खोलना चाहती है. ऐन डी एम सी और दिल्ली कैंट एक अलग जोन होगा जिसमे 29 दुकाने खुलेगीं और दिल्ली एअरपोर्ट में 10 दुकानें. हम सरकार की इस नीति का समर्थन करते हैं लेकिन यह मांग करते हैं कि इस पर सरकारी नियंत्रण रखा जाए ना कि निजीकरण के तहत इस तरह की नीति का पालन किया जाए. यदि सरकार बड़े व्यापारियों के द्वारा जोन वाइज सरकारी दुकान खोलती है तो इससे मनमानी बढ़ेगी और इन दुकानों में कुछ सप्लायरों का एकछत्र राज हो जाएगी और सरकारी नियंत्रण ख़त्म होने से संभवतः भ्रष्टाचार भी बढ़ेगा.

परिसंघ ने मांग करते हुए कहा कि दिल्ली पर्यटन, दिल्ली सिविल सप्लाई, दिल्ली कंजूमर एवं दिल्ली औद्योगिक निगम के कर्मचारियों/कर्मचारी प्रतिनिधियों के साथ सरकार संवाद स्थापित करें और नई नीति बनाने के समय इनकी भावनाओं का ध्यान रखा जाए और इनको भी इस प्रक्रिया में शामिल कर इनके अनुभव एवम सेवा का लाभ उठाए. हम हर कदम पर दिल्ली सरकार के साथ हैं और जल्द से जल्द हमें मुलाकात का समय दिया जाए ताकि हम आपके साथ बैठकर दिल्ली में राजस्व को कैसे बढ़ाया जाए इस पर गंभीर चिंतन करें और कर्मचारियों की नौकरियों को कैसे बचाया जाए, निगमों को तालाबंदी से कैसे बचाया जाए इस पर भी चर्चा की जा सके. रिपोर्ट- कंचन अरोड़ा

 

 

 

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